
सुंदर अप्सरा सा बेदाग चेहरा, चमकदार ललाट, कश्मीरी सेब जैसे सुरमई गाल, गुलाब की पंखुड़ियां से होंठ, सुराहीदार गर्दन, सिंदूरी रंग, हिरनी जैसी आंखें, कोयल सी आवाज, मोरनी सी चाल और किसी का भी ईमान खराब कर देने वाला जिस्म। और असलियत….? असलियत तो वही जानेगा जो पढेगा इस कहानी को, जिसका नाम है , ‘ अप्सरा ‘
अप्सरा
भाग 1
आधी रात का समय था और कड़कड़ाती सर्दी का मौसम होने की वजह से कानपुर स्टेशन पर सन्नाटा पसरा हुआ था। दूर नजर उठाने पर इक्का दुक्का लोग ही दिखाई दे रहे थे।
प्लेटफार्म नंबर छह पर बेंच पर एक खुबसूरत युवती बैठी थी। रात के अंधेरे में भी उसका चेहरा चाँद की तरह दमक रहा था। उसके होंठ गुलाबी की पंखुड़ियों जैसे मखमली थे और चेहरे पर मौजूद काला तिल उसकी खुबसूरती में चार चाँद लगा रहा था।
कंपकंपाती सर्द हवाओं के बावजूद उस अप्सरा ने अपने शरीर पर सिर्फ एक पतला सा सूट पहना था। उसने अपने दोनों पैरों को मोड़े हुए थे और अपना सिर उन मुड़े हुए पैरों के घुटनों पर लगभग टिका रखा था।
रेलवे स्टेशन पर होने के बावजूद भी उसे देखकर कोई यह नहीं कह सकता था कि वह किसी ट्रेन का इंतजार कर रही थी या फिर उसे कहीं जाने की जल्दी थी।
काफी देर तक वह ऐसे ही बैठी रही फिर स्टेशन पर अनाउंसमेंट हुआ-
“यात्रीगण कृपया ध्यान दें-
तेज रफ्तार मालगाड़ी प्लेटफार्म नंबर छह से गुजरेगी!”
यह सुनते ही वह युवती तेजी से हरकत में आयी। उसके ढीले ढाले शरीर में अचानक से फुर्ती नजर आने लगी। वह एक झटके से बेंच से उठ खड़ी हुई और दूर तेज रफ्तार से आ रही सुपर फास्ट ट्रेन को एक टक देखने लगी। अगले ही पल वह एक झटके से कूदकर रेल की पटरी पर जा खड़ी हुई।
सुपर फास्ट ट्रेन तेज गति से उसी की तरफ बढ़ती चली आ रही थी लेकिन इस बात की युवती को जरा सी भी चिंता नहीं थी और होती भी क्यों? आखिर वह तो खुद ही आत्महत्या के इरादे से वहां पहुंची थी।
तेज रफ्तार सुपर फास्ट ट्रेन हॉर्न बजाते हुए बस अब प्लेटफार्म पर पहुंचकर कुछ ही पलों में उस रूपवती युवती को कुचलने वाली थी।
ठीक यही वह पल था। जब बगल वाले प्लेटफार्म पर खड़े रामप्रसाद की नजर उस पर पड़ी। अगले ही पल रामप्रसाद सारा मामला समझ गया और लगभग चिल्लाता हुआ उसकी तरफ भागा।
“अरे ओ मैडम! पटरी पर से हटो! मरना है क्या?”
राम प्रसाद की बातों को सुनकर युवती ने धीरे से मुड़कर पीछे की तरफ देखा और फिर वापस सामने की तरफ देखने लगी।
ऐसा लग रहा था जैसे वह युवती नहीं बल्कि कोई रोबोट हो। उधर सामने से ट्रेन लगातार बढ़ती चली आ रही थी। अब युवती और ट्रेन के बीच बस जरा सा ही फांसला बचा था।
रामप्रसाद ने आव देखा न ताव तेजी से उस युवती को बचाने के लिए दौड़ पड़ा।
बिजली की तेज़ी से उसने युवती को जोर से धक्का दिया जिससे वह पटरी के दूसरी तरफ जा गिरी, और ट्रेन अपनी तेज रफ्तार से प्लेटफार्म पर से गुजर गई। ट्रेन के जाते ही रेलवे स्टेशन पर वापस से वही सन्नाटा छा गया। ट्रेन की हल्की हल्की आवाज अभी भी सुनाई दे रही थी।
राम प्रसाद, जो उस समय उस युवती से कुछ ही कदमों की दूरी पर खड़ा था। वह हल्के हल्के कदमों से लड़की की तरफ बढ़ा और फिर उस युवती के पास बैठकर बोला, “तुम पागल हो क्या? तुम्हें इतनी बड़ी ट्रेन दिखाई नहीं दे रही थी? मरना चाहती थी क्या?”
रामप्रसाद जवाब की उम्मीद में कुछ सेकंड रुक गया। मगर उसे कुछ जवाब नहीं मिला। लड़की जैसे पड़ी थी वैसे ही पड़ी रही। उसमें जरा सी भी हरकत नहीं हो रही थी। रामप्रसाद को यह थोड़ा अजीब लगा।
इस बार वह उसे हिलाते हुए थोड़ी ऊँची आवाज में बोल उठा, “क्या तुम्हें सुनाई नहीं देता? क्या तुम्हारे दिमाग के साथ साथ कान भी खराब है?”
लेकिन युवती ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने आगे बढ़कर देखा तो उसके होश उड़ गए। युवती के सिर से खून बह रहा था। यह देखते ही रामप्रसाद घबरा गया और तेज़ी से उससे दूर हट गया और गिरते पड़ते हुए वहाँ से भागने लगा। ठीक तभी उसे उसके अंतर्मन से एक आवाज सुनाई दी-
“रुक जा रामप्रसाद…रुक जा! कहाँ भाग रहा है?”
रामप्रसाद बोला, “वह लड़की मर गई है। पुलिस मुझे उठा कर लेकर जाएगी। मुझे लाश के पास देख सब मुझे ही कातिल समझेंगे।”
उसकी अंतरात्मा फिर बोल उठी, “क्या तुम्हें विश्वास है कि वह लड़की मर चुकी है? हो सकता है वह जिंदा हो। जा उसे उठा… उसको डॉक्टर के पास ले जा…किसी को मरता हुआ छोड़कर तू कैसे जा सकता है? अगर उसकी जगह तेरी बेटी होती तो…?
अपनी अंतरात्मा की आवाज सुन रामप्रसाद में थोड़ी हिम्मत आ गई। वह पीछे की तरफ मुड़ा और युवती के करीब जा पहुंचा। युवती अभी भी पटरी के ऊपर बेहोश पड़ी हुई थी।
रामप्रसाद ने उसे उठाने की कोशिश की लेकिन उस लड़की को चाहकर भी उठा नहीं पा रहा था। कुछ सेकंड रुककर उसने मदद माँगने के लिए आसपास नजरें घुमाई लेकिन दूर दूर तक कोई नहीं था।
तभी अचानक से एक बार फिर अनाउंसमेंट सुनाई पड़ी, “गाड़ी नंबर 19046 छपरा से चलकर सूरत को जाने वाली गाड़ी कुछ ही समय में प्लेटफार्म नंबर 7 पर आने वाली है।”
अनाउंसमेंट सुनते ही राम प्रसाद बुरी तरह हड़बड़ा गया क्योंकि युवती प्लेटफार्म नंबर सात पर ही पड़ी हुई थी और वह पूरी ताकत लगाकर भी उसे उठा नहीं पा रहा था। वह किसी भी तरह उस युवती को बचाना चाहता था लेकिन चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहा था। उसकी लाचारी भरी नजरें मदद के लिए प्लेटफार्म के चारों तरफ घूम रही थी लेकिन दूर दूर तक कोई भी नजर नहीं आ रहा था।
क्रमशः
भाग 2
जब उसे किसी से भी कोई मदद मिलने की संभावना नहीं दिखी तो उसने अपने शरीर की सारी ताकत लगाकर किसी तरह उस युवती को पटरी से खिसकाते हुए एक साइड कर लिया।
ठीक यही वो पल था जब ट्रेन धीरे धीरे हॉर्न बजाते हुए उसी प्लेटफार्म की तरफ बढ़ती दिखाई दी।
पूरी ट्रेन यात्रियों से खचाखच भरी हुई थी मगर सभी यात्री सोए हुए थे। ट्रेन धीरे धीरे प्लेटफार्म नंबर सात पर आकर रुकी। कुछ इक्के दुक्के यात्री प्लेटफार्म पर उतरे।
रामप्रसाद अभी भी दोनों पटरियों के बीच में उस युवती को संभालते हुए मदद की अभिलाषा से इधर उधर देख रहा था।
उसने कई बार ट्रेन से उतरे यात्रियों को मदद के लिए आवाज लगाई लेकिन किसी ने भी उसकी तरफ एक नज़र तक नहीं डाली।
कुछ ही देर बाद ट्रेन ने तीन बार हॉर्न बजाया और धीरे धीरे रफ्तार पकड़ते हुए प्लेटफार्म से निकलती चली गई।
रामप्रसाद अभी भी वहीं लाचारी भरी नजरों से इधर उधर देख रहा था लेकिन तभी अचानक उसकी नजरें प्लेटफार्म के दायीं ओर गई तो उसकी आँखों में आस जाग उठी।
दायीं ओर वाले प्लेटफार्म पर खड़े होकर एक युवक चहलकदमी कर रहा था। उसके शर्ट पर उसके नाम का टैग लगा हुआ था। उस युवक का नाम यश कुमार था।
रामप्रसाद ने उसे देख अपना हाथ हवा में लहराते हुए कहा, “अरे भैया! आवा तनी देखअ! ई लड़की के कछु हो गइल बा!”
यश कुमार पहली ही नजर में सारा मामला समझ गया। उसने अपना बैग पीठ पर से उतारा और प्लेटफार्म पर रखकर फटाफट दौड़ते हुए राम प्रसाद के पास आ पहुँचा।
उसने लड़की की तरफ एक नज़र डाली और फ़िर रामप्रसाद की तरफ देखते हुए पूछा, “कौन है यह लड़की? क्या हुआ है इसको? क्या किया है तुमने इसके साथ?”
एक साथ इतने सारे सवालों को सुनकर रामप्रसाद घबरा गया और फिर हड़बड़ाते हुए बोला, “ देखो भैया, यह कौन है, यह तो मुझे नहीं पता। यह पटरी के आगे खड़ी होकर मरने जा रही थी तो हमने इसको बचाने के लिए धक्का दिया था लेकिन शायद इसे चोट लग गई। मेरी बात का भरोसा करो, इसमें हमारी कोई गलती नहीं है।”
यश कुमार गुस्से में चिल्लाते हुए बोला, “यू इडियट… अब यहाँ खड़े रहकर तुम किसका इंतजार कर रहे हो? इसे तुरंत हॉस्पिटल लेकर जाना चाहिए था ना?”
“अरे भैया! मैं भी इसे अस्पताल ले जाना चाहता हूँ लेकिन इसे उठाना मेरे बस की बात नहीं है। मैंने मदद के लिए ही तो आपको बुलाया है।”
रामप्रसाद की बात सुनकर यश गुस्से से आग बबूला हो गया और लगभग गुर्राते हुए बोल उठा, “यू इडियट… अगर ऐसी बात थी तो तुम्हें तुरंत स्टेशन मास्टर या पुलिस को खबर करनी चाहिए थी। देखो, लड़की के सिर से कितना ख़ून बह रहा है। तुम्हारी लापरवाही से इसकी जान भी जा सकती है।”
उसकी गुस्से भरी आवाज सुनकर रामप्रसाद घबराते हुए बोल उठा, “पु….पुलिस के पास… ना…ना… पुलिस के पास जाएंगे तो वह हमें ही पकड़ कर अंदर डाल देगी?”
रामप्रसाद को इस तरह घबराते देख यश कुमार ने जैसे तैसे अपने गुस्से को कंट्रोल किया और फिर थोड़े से शांत स्वर में बोला, “ठीक है, तुम यहीं इस लड़की के पास रुको। मैं अभी कोई मदद लेकर आता हूँ।”
कहने के साथ वह तेजी से प्लेटफार्म पर चढ़ गया और कुछ ही देर में वहाँ से गायब हो गया। अब फिर से वह प्लेटफार्म पूरी तरह सन्नाटे में डूबा नजर आ रहा था।
तभी अचानक रामप्रसाद के दिमाग में एक विचार कौंधा, “कहीं…कहीं…यह लड़की कोई चुड़ैल तो नहीं है, जो इस तरह आधी रात को यहाँ प्लेटफार्म पर घूम रही थी और अब यह कुछ ही देर बाद मुझपर हावी हो जाएगी। हाँ, हो सकता है आखिर इस लड़की को उठाने में ही मेरे पसीने छूट गए थे।”
यह विचार दिमाग में आते ही रामप्रसाद की घिग्घी बँध गई। उसके हाथ पैर काँपने लगे। ऐसा लग रहा था जैसे वह वहीं पर बेहोश हो जाएगा।
तभी उसकी नज़र प्लेटफार्म के दूसरी तरफ लगी उस डिजिटल घड़ी पर गई। जिसमें रात के ठीक तीन बजे का समय नजर आ रहा था।
“तीन बज रहे हैं! कहा जाता है कि रात की तीन बजे बुरी आत्माएँ और भूत प्रेत सन्नाटे भरी जगह पर सैर करते हैं। इस समय बुरी शक्तियाँ शक्तिशाली हो जाती है। हे भगवान! यह तूने मुझे कहाँ फँसा दिया। काश मैंने कल सुबह की ही ट्रेन से जाने का फैसला लिया होता। कम से कम मैं इस झंझट में तो नहीं पड़ता।”
बुरी तरह से काँपता हुआ रामप्रसाद मन ही मन बड़बड़ाए जा रहा था। ठीक उसी समय उसने उसी युवक को अपनी तरफ आते देखा जो उसके लिए मदद लेने गया था।
उस युवक के साथ एक पुलिसवाला, एक डॉक्टर और एक पैरामेडिकल स्टाफ के आदमी भी उसकी तरफ तेजी से बढ़ते चले आ रहे थे।
पुलिस वाले को देखते ही रामप्रसाद के होश उड़ गए। उसे ऐसा लगने लगा जैसे वो लोग उस युवती को बचाने के लिए नहीं बल्कि उसे गिरफ्तार करने के लिए आ रहे हो। वह वहाँ से भाग जाना चाहता था लेकिन उसके पैर उसका साथ नहीं दे रहे थे।
कुछ ही देर बाद वे सभी लोग रामप्रसाद के बिल्कुल सामने खड़े थे और रामप्रसाद के होश उड़ चुके थे।
क्रमशः
भाग 3
अपने सामने पुलिस वाले को खड़ा देखकर रामप्रसाद गिड़गिड़ा उठा- “साहब हमने कुछ नहीं किया…हमने कुछ नहीं किया ! हम निर्दोष है।”
पुलिसवाले ने उसकी बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया। उधर डॉक्टर ने तुरंत आगे बढ़कर युवती का हाथ पकड़कर उसकी नब्ज चैक की और बोल उठा, “यह अभी जिंदा है। इसे जल्द से जल्द हॉस्पिटल ले जाना होगा।”
अगले ही पल पुलिस वाले और यश कुमार ने मिलकर लड़की को उठाया और स्ट्रेचर पर लेटा दिया। इसी के साथ पैरामेडिकल स्टाफ का आदमी स्ट्रेचर धकेलते हुए प्लेटफार्म की तरफ बढ़ गया। उसके पीछे पीछे डॉक्टर और यश कुमार भी स्टेशन से बाहर की तरफ बढ़ रहे थे।
वहीं दूसरी और रामप्रसाद अभी भी दोनों पटरियों के बीच में मूर्ति की तरह खड़ा था।
तभी पुलिसवाले ने उससे पुलिसिया लहजे में कहा, “अब क्या रात भर यहीं खड़ा रहेगा? ऊपरवाले से दुआ कर कि लड़की जिंदा बच जाए वरना इतनी धाराएँ लगाऊँगा कि आजीवन जेल की चक्की पिसता रह जाएगा।”
पुलिस वाले की बात सुनकर रामप्रसाद घबराते हुए बोल उठा, “साहब, हमने कुछ नहीं किया। हमने लड़की को नहीं मारा… हम तो उसे जानते भी नहीं है…वह तो…”
“अबे चुप कर! कितनी बक बक करता है! किसने किसको मारा है, यह तो अब लड़की के होश में आ जाने पर ही पता लगेगा।”
पुलिस वाले ने कहा तो रामप्रसाद के माथे से पसीना बरसने लगा। उसने गमछे से पसीना पौंछा और फिर पुलिस वाले से मिन्नत करते हुए बोला, “साहब वह लड़की तो…”
इससे पहले कि रामप्रसाद अपनी बात पूरी कर पाता, पुलिस वाला बीच में ही टोकते हुए गुस्से से गुर्रा उठा- “ चुप! एकदम चुप हो जा। अगर तूने अब एक और बार भी मुँह खोला तो इसी डंडे से तेरी चमड़ियाँ उधेड़ दूँगा! चुपचाप चल मेरे साथ…”
और इसी के साथ पुलिस वाला रामप्रसाद को अपने साथ लेकर स्टेशन से बाहर की तरफ बढ़ गया।
एंबुलेंस में लड़की को लेटा दिया गया था। यश कुमार के साथ साथ पुलिस वाला रामप्रसाद को अपने साथ लेकर सवार हो गया। अगले ही पल हवा से बातें करते हुए एंबुलेंस सिटी हॉस्पिटल की तरफ तेजी से बढ़ने लगी।
ब्रह्म मुहूर्त का समय था। सड़कें बिल्कुल सुनसान नजर आ रही थी। कुछ ही मिनटों में एंबुलेंस सिटी हॉस्पिटल के सामने आ खड़ी हुई। एंबुलेंस के पहुँचते ही हॉस्पिटल का पैरामेडिकल स्टाफ हरकत में आया।
कुछ ही देर बाद युवती को आइसीयू में ले जाया गया और इसी के साथ उसका ट्रिटमेंट शुरू कर दिया गया।
इधर बाहर सभी की साँसे अटकी हुई थी। कोई भी उस लड़की के बारे में कुछ भी नहीं जानता था। सबसे ज्यादा तो रामप्रसाद की हालत खराब हो रही थी। डर की वजह से उसका चेहरा पीला पड़ गया था। ऐसा लग रहा था जैसे अगर लड़की को कुछ हो गया तो उसे फाँसी पर लटका दिया जाएगा।
तभी अचानक से आइसीयू का दरवाजा हल्का सा खुला और अंदर से एक नर्स दौड़ते हुए बाहर आई। उसके हाथ में दवाई की पर्ची थी।
उसने सभी की तरफ देखते हुए पूछा, “ आप लोगों में से लड़की के रिलेटिव कौन हैं? यह दवाई जल्दी से लानी है!”
रामप्रसाद और बाकी सभी ने एक दूसरे की तरफ देखा।
तभी अचानक से यश कुमार बोल उठा, “सिस्टर, लाइए दवाई की पर्ची मुझे दीजिए। मैं दवाई लेकर आता हूँ। यहाँ मेडिकल स्टोर्स कहाँ है?”
नर्स ने अपनी उँगली से इशारा करते हुए कहा, “मेडिकल! वहाँ उस तरफ है!”
इतना सुनते ही यश कुमार पर्ची लेकर बड़ी तेजी से मेडिकल स्टोर्स की तरफ लपका और कुछ ही देर बाद दवाइयाँ लेकर नर्स के पास वापस आ पहुँचा। उसने उसके हाथों में दवाई की थैली देते हुए पूछा, “ वह ठीक तो है ना? किसी तरह का कोई खतरा तो नहीं है?”
“अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। फिलहाल ट्रिटमेंट चल रहा है बाकी आपको डॉक्टर साहब ही बता पाएंगे।”
इतना बताने के साथ ही नर्स तेजी से वापस आईसीयू रूम में चली गई। इधर बाहर रामप्रसाद और यश कुमार उस युवती की सलामती की प्रार्थना करने लगे।
इतनी देर तक पुलिस वाले के साथ रहने की वजह से अब रामप्रसाद का डर भी थोड़ा कम हो चुका था। वह तीनों ही बड़ी बेसब्री से डॉक्टर के आईसीयू से बाहर आने का इंतजार कर रहे थे लेकिन उन्हें ज्यादा देर इंतजार नहीं करना पड़ा।
कुछ ही देर बाद आईसीयू का दरवाजा खुला और डॉक्टर साहब बाहर आते दिखाई दिये। डॉक्टर के बाहर आते ही पुलिस वाला तेजी से उनकी तरफ बढ़ गया।
क्रमशः –
भाग 4
डॉक्टर साहब आईसीयू रूम से निकलकर अपने केबिन की तरफ बढ़ गए। पुलिस इंस्पेक्टर को उन्होंने कुछ देर रुकने का इशारा किया और फिर अपने केबिन के अंदर चले गए।
कुछ देर बाद नर्स ने पुलिस इंस्पेक्टर को इशारा करते हुए कहा, “सर, अब आप डॉक्टर साहब से मिल सकते हैं।”
इतना सुनते ही पुलिस वाला, रामप्रसाद और यश कुमार को अपने साथ लेकर डॉक्टर के केबिन में जा पहुँचा।
डॉक्टर साहब ने मुस्कुराते हुए कहा,“अच्छा हुआ आप लोग सही समय पर उसे हॉस्पिटल ले आए वरना कुछ भी हो सकता था।”
यश कुमार ने उत्सुकता से पूछा, “ डॉक्टर! अब उसकी कंडीशन कैसी है? क्या वह खतरे से बाहर है?”
“जी बिल्कुल, अब वह एकदम सेफ है। उसकी जान को कोई खतरा नहीं है।”
डॉक्टर की यह यह बात सुनकर तीनों ने राहत की साँस ली।
पुलिसवाले ने मुस्कुराते हुए पूछा, “डॉक्टर साहब क्या उसे होश आ गया है? हमें उसका बयान लेना है?”
डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा, “अभी तो वह होश में नहीं है मगर एक दो घंटे में उसे होश आ जाएगा! तब तक आप लोग बाहर बैठकर इंतजार कर सकते हैं।”
“थैंक यू!”
कहने के साथ पुलिस इंस्पेक्टर यश कुमार और रामप्रसाद के साथ केबिन से बाहर निकलकर आईसीयू रूम के बाहर जाकर बैठ गया।
उन सभी के चेहरे पर एक अलग सी ही खुशी की लहर थी। मानो उनके सिर पर से कोई बहुत बड़ा बोझ हट गया हो!
***
घड़ी में सुबह के सात बज चुके थे। अस्पताल के बाहर वाली चाय की दुकान खुल चुकी थी। यश कुमार तुरंत सभी के लिए चाय नाश्ता ले आया। पुलिस इंस्पेक्टर, राम प्रसाद और यश कुमार तीनों ने मिलकर चाय की चुस्कियाँ ली और इसी के साथ उन तीनों की आपस में बातचीत होना शुरू हो गई।
यश कुमार ने राम प्रसाद से कहा, “रामप्रसाद जी, मुझे माफ करना। अनजाने में मैंने आपको रेलवे स्टेशन पर बहुत बुरा भला कहा था।”
रामप्रसाद ने मुस्कुराते हुए कहा, “अरे! कोई बात नहीं साहब! माफी माँगने की कोई जरूरत नहीं है। उस समय हालात ही ऐसे थे कि किसी को भी गलतफहमी हो जाए।”
यश कुमार ने धीरे से पूछा, “क्या आप इस लड़की को सच में नहीं जानते!”
रामप्रसाद जल्दी से बोल उठा, “नहीं…नहीं…मेरा उस लड़की से कोई वास्ता नहीं है। वह लड़की तो आत्महत्या करने जा रही थी तो मैंने उसे बचाने की कोशिश की लेकिन उसी चक्कर में वह दूसरी पटरी पर जा गिरी।”
पुलिसवाला धीमी आवाज में बोला, “हम्म! हो सकता है तुम सच बोल रहे हो लेकिन अब तो सबकुछ उस लड़की के बयान पर निर्भर है।”
रामप्रसाद ने मुस्कुराते हुए कहा, “ जी साहब, वह भी बयान में यही कहेगी। हमने तो उसे बचाने के लिए ही उसे धक्का दिया था।”
तभी अचानक से यश कुमार पूछ उठा, “पहले यह तो बताओ कि तुम इतनी रात को रेलवे स्टेशन पर गए ही क्यों थे?”
“हमको अपनी बीवी के मायके जाना था। हमने रात वाली ट्रेन का टिकट बुक किया था लेकिन हमारी घर में ही आँख लग गई। रात को स्टेशन पहुँचने में लेट हो गये जिससे गाड़ी छूट गई। शायद हमारी किस्मत ही खराब थी। कहाँ के लिए निकले थे और कहाँ आकर फँस गए।”
रामप्रसाद ने पूरी बात बताई तो यश कुमार मुस्कुराते हुए बोल उठा, “तुम्हारी किस्मत खराब नहीं थी। बल्कि नियति ने तुम्हें उस लड़की की जान बचाने का मौका दिया था।”
रामप्रसाद ने सहमति में अपना सिर हिलाते हुए कहा, “हाँ, ऐसा कहा जा सकता है।”
इंस्पेक्टर बोला, “वैसे रामप्रसाद अगर तुमने सचमुच उस लड़की को बचाया है तो तुम बहुत बहादुर हो! तुमने बहुत ही अच्छा काम किया है!”
रामप्रसाद ने उन्हें भरोसा दिलाते हुए कहा, “साहब हम सच ही बोल रहे हैं। अभी बिटिया को होश आ जाएगा तो आप उसी से पूछ लीजिएगा!”
इसी तरह इंतजार करते हुए दो घंटे बित गए। तभी अचानक से आईसीयू का दरवाजा भड़ाक करके खुला। नर्स उनके पास दौड़ते हुए आई और बोली, “लड़की को होश आ गया है। आप लोग चाहे तो उससे मिल सकते हैं।”
इतना सुनते ही उन तीनों के शरीर में बिजली सी दौड़ गई। तीनों ही बड़ी तेजी से आइसीयू की तरफ लपके।
क्रमशः
भाग 5
आईसीयू बेड पर वो युवती लेटी हुई थी। उसके सिर पर पट्टियाँ बँधी हुई थी। हाथ में ड्रीप लगी हुई थी।
पुलिस इंस्पेक्टर ने उसके करीब जाकर उससे पूछा, “क्या तुम अभी बयान देने की स्थिति में हो?”
युवती धीमी और दबी दबी आवाज में बोली, “जी!”
इंस्पेक्टर ने तेज आवाज में पूछा, “क्या तुमने आत्महत्या करने की कोशिश की थी?”
युवती ने कोई जवाब नहीं दिया और अपना चेहरा दूसरी तरफ घूमा लिया।
इंस्पेक्टर ने दोबारा पूछा, “मैं पूछ रहा हूँ कि क्या तुमने आत्महत्या की कोशिश की थी?”
युवती ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा, “हाँ! मैं आत्महत्या करने के लिए ही स्टेशन पहुँची थी लेकिन एन मौके पर एक बुजुर्ग ने मुझे बचाने के लिए पटरी पर से धक्का दे दिया और मैं दूसरी तरफ जा गिरी। उधर दूसरी पटरी पर शायद कुछ तीखी सी चीज पड़ी हुई थी। बस उसी की वजह से मेरे सिर पर घाव हो गया। उसके बाद क्या हुआ मुझे कुछ पता नहीं।”
इंस्पेक्टर ने मुस्कुराकर रामप्रसाद की तरफ देखते हुए कहा, “रामप्रसाद, तुम सच बोल रहे थे! तुम वाकई में बहुत बहादुर हो। तुमने इस लड़की की जान बचाई है।”
रामप्रसाद मुस्कुराते हुए बोला, “साहब, हम तो आपको पहले ही कह रहे थे आप ही हमारी बातों पर यकीन नहीं कर रहे थे। अब तो आपको यकीन हो गया ना?”
पुलिस इंस्पेक्टर ने युवती से पूछा, “अब यह बताओ कि आखिर तुम आत्महत्या क्यों करना चाहती थी?”
लेकिन युवती ने कोई जवाब नहीं दिया। फिर रामप्रसाद ने बड़े प्यार से उससे पूछा, “ बताओ ना बेटी, ऐसी कौन सी तकलीफ थी तुम्हें जो तुमने आत्महत्या जैसा कदम उठा लिया?”
साथ ही साथ यश कुमार ने भी पूछा, “हाँ बताइए कि आखिर इतना बड़ा कदम उठाने की वजह क्या थी?”
लेकिन युवती अभी भी चुप्पी साधे हुए थी। उसने कोई जवाब नहीं दिया।
आखिरकार रामप्रसाद से रहा नहीं गया और वह पुलिस इंस्पेक्टर की तरफ देख थोड़े गुस्से भरे स्वर में बोल उठा, “यह लड़की तो कोई जवाब ही नहीं दे रही है। अब आप इसको इसकी आत्महत्या करने की वजह जाने बिना बिल्कुल भी मत छोड़ना वरना क्या पता यह फिर से खुदकुशी करने की कोशिश करें। मेरी मानो तो आप इसको जेल में डाल दो।”
इतना सुनते ही पुलिस इंस्पेक्टर और यश कुमार की हँसी छुट गई। इसी के साथ युवती भी हँसने लगी।
आखिरकार रामप्रसाद थोड़ा आगे बढ़ा और उसने युवती के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए पूछा,” बताओ बिटिया तुमने आत्महत्या की कोशिश क्यों की थी? क्या किसी ने तुम्हारे साथ कुछ ग़लत किया था? तुम हमको बता सकती हो! दरोगा साहब है ना! यह तुम्हारी पूरी मदद करेंगे!”
“ठीक है, आप सबको यही जानना है ना कि मैं आत्महत्या क्यों करना चाहती हूँ तो सुनिए…..
मेरा जन्म यहीं कानपुर में हुआ था। मेरे पिता मजदूरी करते हैं और माँ घर की देखभाल करती है। मेरी दो बहनें हैं एक छोटी और एक बड़ी, उनके बीच मैं अकेला ही भाई हूँ।”
लड़की की बात सुनते ही तीनों का सिर चकरा गया। तीनों ने हैरानी भरी नजरों से एक दूसरे की तरफ देखा।
यश कुमार ने हैरान होते हुए कहा, “तुम अपने आपको भाई क्यों कह रही हो? तुम तो लड़की हो।”
युवती मुस्कुराते हुए बोल उठी, “नहीं मैं लड़की नहीं लड़का हूँ।”
रामप्रसाद ने तुरंत पुलिस वाले से कहा, “साहब, तुरंत डॉक्टर साहब को बुलाओ। लगता है चोट की वजह से बिटिया की दिमागी हालत खराब हो गई है। यह अपने आपको लड़का बता रही है।”
इतना सुनते ही युवती ने हँसते हुए कहा, “नहीं… नहीं… बाबूजी मैं सच बोल रही हूँ। मैं लड़का ही हूँ, लड़की नहीं!”
इंस्पेक्टर ने हल्का सा गुस्सा दिखाते हुए कहा, “क्या तुमने हम सबको बेवकूफ समझ रखा है जो अपने आपको लड़का बता रही हो? चलो मान लिया कि तुम लड़के हो तो फिर यह बताओ कि तुमने लड़कियों वाले कपड़े क्यों पहने हैं? और तुम्हारी आवाज़ लड़कियों जैसी क्यों है?”
युवती ने मुस्कुराते हुए कहा, “साहब, दरअसल मैं ना तो लड़की हूँ और ना ही लड़का हूँ। मैं एक किन्नर हूँ। जी हाँ, मैं वही किन्नर हूँ, जिसे समाज गलत नजरों से देखता है, वही किन्नर जिसका हर जगह अजीब अजीब नाम से मजाक उड़ाया जाता है। समाज में जिसे कोई इज्जत नहीं मिलती।
दुनिया वाले एक पल को भी यह नहीं सोचते कि किन्नर भी उसी ईश्वर के बनाए हुए हैं, जिन्होंने उन सभी को बनाया है।
उसी समाज की वजह से मैंने आत्महत्या की कोशिश की थी। हाँ, मैं मरना चाहता हूँ। अब बताओ दरोगा साहब, क्या आप समाज की सोच बदल सकेंगे? दिलवा सकेंगे हम किन्नरों को सामान्य जीवन जीने का हक़? जहाँ भी जाता हूँ, खुद के जन्म लेने पर अफसोस होता है।”
कहने के साथ युवती रोने लगी। उसकी आँखों से आंसू बरसने लगे। वहीं युवती की बात सुन तीनों लोग सन्न रह गए। उनके मुंह से बोल नहीं फूट रहे थे।
समाप्त।