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भूखा

रात के सन्नाटे में, रोहन का पेट जोर-जोर से चिल्ला रहा था। वह पिछले दो दिनों से भूखा था। जेब में एक भी पैसा नहीं, घर में खाने का एक दाना भी नहीं। मजबूरी में, वह शहर के पुराने बाज़ार की तरफ निकल पड़ा, जहाँ रात को भी कुछ ढाबे खुले रहते थे।

चलते-चलते उसकी नज़र एक अजीब-सा ठेला पर पड़ी। उस पर एक बोर्ड लगा था—

“भूख मिटाने वाला भोजन – बस एक शर्त पर!”

रोहन की आँखें चमक उठीं। वह ठेले के पास गया, जहाँ एक बूढ़ा आदमी बैठा था। उसकी आँखें गहरी और ठंडी थीं।

“क्या मिलेगा खाने के लिए?” रोहन ने हकलाते हुए पूछा।

बूढ़े ने मुस्कुराकर ढक्कन हटाया। अंदर गरमा-गरम बिरयानी थी, जिसकी खुशबू से रोहन की लार टपक पड़ी।

“तू जितना चाहे खा सकता है,” बूढ़े ने कहा, “बस… कीमत बाद में चुकानी होगी।”

भूख से तड़प रहे रोहन ने बिना सोचे-समझे थाली उठा ली और गपागप खाने लगा। हर निवाला इतना स्वादिष्ट था कि उसने जिंदगी में पहले कभी ऐसा खाना नहीं खाया था।

जब पेट भर गया, तो उसने चैन की सांस ली। “अब कीमत क्या है?”

बूढ़े ने ठंडी आवाज़ में कहा, “अब तेरी भूख कभी खत्म नहीं होगी।”

रोहन हँस पड़ा, लेकिन तभी उसे महसूस हुआ—उसका पेट अभी भी भूखा था। इतनी बिरयानी खाने के बाद भी, उसे और चाहिए था। उसका पेट अंदर से जल रहा था, जैसे किसी आग में भुन रहा हो।

वह चीखने लगा। उसने और खाना मांगा, लेकिन बूढ़ा गायब हो चुका था। रोहन अब सड़कों पर भटकने लगा, किसी भी कीमत पर खाने की तलाश में। वह खाता गया, खाता गया, लेकिन उसकी भूख कभी नहीं मिटी।

कुछ दिनों बाद, लोग कहते हैं, उन्होंने एक नया ठेला देखा—

“भूख मिटाने वाला भोजन – बस एक शर्त पर!”

और उस ठेले के पीछे, अब बूढ़े आदमी की जगह, रोहन बैठा था…

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