
सैकड़ों वर्षों से नैतिक कहानियां हमारे वेद पुराणों की मदद और हमारे पुरखों की जुबानी हमारा मार्गदर्शन करती आई हैं, नैतिकता और शिक्षा से भरी इन्हीं कहानियां का अद्भुत संग्रह है यह मोरल स्टोरी यानी नैतिक कहानियों का संग्रह
भाग 1
*घमंड और साधना*
संत कबीर गांव के बाहर झोपड़ी बनाकर अपने पुत्र कमाल के साथ रहते थे. संत कबीर जी का रोज का नियम था- नदी में स्नान करके गांव के सभी मंदिरों में जल चढाकर दोपहर बाद भजन में बैठते, शाम को देर से घर लौटते।
वह अपने नित्य नियम से गांव में निकले थे.इधर पास के गांव के जमींदार का एक ही जवान लडका था जो रात को अचानक मर गया.रात भर रोना-धोना चला।
आखिर में किसी ने सुझाया कि गांव के बाहर जो बाबा रहते हैं उनके पास ले चलो.शायद वह कुछ कर दें.सब तैयार हो गए.लाश को लेकर पहुंचे कुटिया पर.देखा बाबा तो हैं नहीं,अब क्या करें ?
तभी कमाल आ गए.उनसे पूछा कि बाबा कब तक आएंगे ? कमाल ने बताया कि अब उनकी उम्र हो गई है.सब मंदिरों के दर्शन करके लौटते-लौटते रात हो जाती है.आप काम बोलो क्या है ?
लोगों ने लड़के के मरने की बात बता दी.कमाल ने सोचा कोई बीमारी होती तो ठीक था पर ये तो मर गया है.अब क्या करें ! फिर भी सोचा लाओ कुछ करके देखते हैं.शायद बात बन जाए।
कमाल ने कमंडल उठाया.लाश की तीन परिक्रमा की.फिर तीन बार गंगा जल का कमंडल से छींटी मारा और तीन बार राम नाम का उच्चारण किया.लडका देखते ही देखते उठकर खड़ा हो गया.लोगों की खुशी की सीमा न रही।
इधर कबीर जी को किसी ने बताया कि आपके कुटिया की ओर गांव के जमींदार और सभी लोग गए हैं.कबीर जी झटकते कदमों से बढ़ने लगे.उन्हें रास्ते में ही लोग नाचते कूदते मिले.कबीर जी कुछ समझ नही पाए।
आकर कमाल से पूछा कया बात हुई ? तो कमाल तो कुछ ओर ही बताने लगा.बोला- गुरु जी बहुत दिन से आप बोल रहे थे ना की तीर्थ यात्रा पर जाना है तो अब आप जाओ यहां तो मैं सब संभाल लूंगा।
कबीर जी ने पूछा क्या संभाल लेगा ? कमाल बोला- बस यही मरे को जिंदा करना,बीमार को ठीक करना.ये तो सब अब मैं ही कर लूंगा.अब आप तो यात्रा पर जाओ जब तक आप की इच्छा हो।
कबीर ने मन ही मन सोचा- चेले को सिद्धि तो प्राप्त हो गई है पर सिद्धि के साथ ही साथ इसे घमंड भी आ गया है.पहले तो इसका ही इलाज करना पडेगा बाद मे तीर्थ यात्रा होगी क्योंकि साधक में घमंड आया तो साधना समाप्त हो जाती है।
कबीर जी ने कहा ठीक है.आने वाली पूर्णमासी को एक भजन का आयोजन करके फिर निकल जाउंगा यात्रा पर.तब तक तुम आस-पास के दो चार संतो को मेरी चिट्ठी जाकर दे आओ.भजन में आने का निमंत्रण भी देना।
कबीर जी ने चिट्ठी मे लिखा था-
कमाल भयो कपूत,कबीर को कुल गयो डूब।
माल चिट्ठी लेकर गया एक संत के पास.उनको चिट्ठी दी.चिट्ठी पढ के वह समझ गए.उन्होंने कमाल का मन टटोला और पूछा कि अचानक ये भजन के आयोजन का विचार कैसे हुआ ?
कमाल ने अहं के साथ बताया- कुछ नहीं.गुरू जी की लंबे समय से तीर्थ पर जाने की इच्छा थी.अब मैं सब कर ही लेता हूं तो मैने उन्हें कहा कि अब आप जाओ यात्रा कर आओ.तो वह जा रहे है ओर जाने से पहले भजन का आयोजन है।
संत दोहे का अर्थ समझ गए.उन्होंने कमाल से पूछा- तुम क्या क्या कर लेते हो ? तो बोला वही मरे को जिंदा करना बीमार को ठीक करना जैसे काम।
संत जी ने कहा आज रूको और शाम को यहां भी थोडा चमत्कार दिखा दो.उन्होंने गांव में खबर करा दी.थोडी देर में दो तीन सौ लोगों की लाईन लग गई.सब नाना प्रकार की बीमारी वाले.संत जी ने कमाल से कहा- चलो इन सबकी बीमारी को ठीक कर दो।
कमाल तो देख के चौंक गया.अरे,इतने सारे लोग हैं.इतने लोगों को कैसे ठीक करूं.यह मेरे बस का नहीं है.संत जी ने कहा- कोई बात नहीं.अब ये आए हैं तो निराश लौटाना ठीक नहीं.तुम बैठो।
संत जी ने लोटे में जल लिया और राम नाम का एक बार उच्चारण करके छींट दिया.एक लाईन में खड़े सारे लोग ठीक हो गए.फिर दूसरी लाइन पर छींटा मारा वे भी ठीक.बस दो बार जल के छींटे मार कर दो बार राम बोला तो सभी ठीक हो के चले गए।
संत जी ने कहा- अच्छी बात है कमाल.हम भजन में आएंगे. पास के गांव में एक सूरदास जी रहते हैं.उनको भी जाकर बुला लाओ फिर सभी इक्ठ्ठे होकर चलते हैं भजन में।
कमाल चल दिया सूरदास जी को बुलाने.सारे रास्ते सोचता रहा कि ये कैसे हुआ कि एक बार राम कहते ही इतने सारे बीमार लोग ठीक हो गए.मैंने तीन बार प्रदक्षिणा की.तीन बार गंगा जल छिड़क कर तीन बार राम नाम लिया तब बात बनी।
यही सोचते-सोचते सूरदास जी की कुटिया पर पहुंच गया.जाके सब बात बताई कि क्यों आना हुआ.कमाल सुना ही रहा था कि इतने में सूरदास बोले- बेटा जल्दी से दौड के जा.टेकरी के पीछे नदी में कोई बहा जा रहा है.जल्दी से उसे बचा ले।
कमाल दौड के गया.टेकरी पर से देखा नदी में एक लडका बहा आ रहा था.कमाल नदी में कूद गया और लडके को बाहर निकाल कर अपनी पीठ जी लादके कुटिया की तरफ चलने लगा।
चलते- चलते उसे विचार आया कि अरे सूरदास जी तो अंधे हैं.फिर उन्हें नदी और उसमें बहता लडका कैसे दिख गया.उसका दिमाग सुन्न हो गया था.लडके को भूमि पर रखा तो देखा कि लडका मर चुका था।GOOD BOOKS:
सूरदास ने जल का छींटा मारा और बोला- “रा”. तब तक लडका उठ के चल दिया.अब तो कमाल अचंभित की अरे इन्हें तो पूरा राम भी नहीं बोला.खाली रा बोलते ही लडका जिंदा हो गया।
तब कमाल ने वह चिट्ठी खोल के खुद पढी की इसमें क्या लिखा है जब उसने पढा तो सब समझ मे आ गया।
वापस आ के कबीर जी से बोला गुरु जी संसार मे एक से एक सिद्ध हैं उनके आगे मैं कुछ नहीं हूं.गुरु जी आप तो यहीं रहिए.अभी मुझे जाकर भ्रमण करके बहुत कुछ सीखने समझने की जरूरत है।
कथा का तात्पर्य कि गुरू की कृपा से सिद्धियां मिलती हैं.उनका आशीर्वाद होता है तो साक्षात ईश्वर आपके साथ खड़े होते हैं.गुरू,गुरू ही रहेंगे.वह शिष्य के मन के सारे भाव पढ़ लेते हैं और मार्गदर्शक बनकर उन्हें पतन से बचाते हैं।
भाग 2
*!! दूसरों के पीछे मत भागो !!*
एक बार स्वामीजी अपने आश्रम में एक छोटे पालतू कुत्ते के साथ टहल रहे थे। तभी अचानक एक युवक उनके आश्रम में आया और उनके पैरों में झुक गया और कहने लगा– “स्वामीजी मैं अपनी जिंदगी से बड़ा परेशान हूं। मैं प्रतिदिन पुरुषार्थ करता हूं लेकिन आज तक मैं सफलता प्राप्त नहीं कर पाया। पता नहीं ईश्वर ने मेरे भाग्य में क्या लिखा है, जो इतना पढ़ा-लिखा होने के बावजूद भी मैं नाकामयाब हूं।”
युवक की परेशानी को स्वामीजी ने तुरंत समझ लिया। उन्होंने युवक से कहा– “भाई! थोड़ा मेरे इस कुत्ते को कहीं दूर तक सैर करा दो। उसके बाद मैं तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर दूंगा।”
उनकी इस बात पर युवक को थोड़ा अजीब लगा लेकिन दोबारा उसने कोई प्रश्न नहीं किया और कुत्ते को दौड़ाते हुए आगे निकल पड़ा। कुत्ते को सैर कराने के बाद, जब एक युवक आश्रम में पहुंचा तो वह देखा कि युवक का चेहरा तेज है लेकिन उसका छोटा कुत्ता थक से जोर-जोर से हांफ रहा था।
स्वामीजी ने पूछा, “भाई, मेरा कुत्ता इतना कैसे थक गया? तुम तो बड़े शांत दिख रहे हो। क्या तुम्हें थकावट नहीं हुई?” युवक ने कहा, “स्वामीजी, मैं धीरे-धीरे आराम से चल रहा था, लेकिन मेरा कुत्ता अशांत था। सभी जानवरों के पीछे दौड़ता था, इसीलिए बहुत थक गया था।”
तब विवेकानंद ने कहा, “भाई, तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर तो यही है! तुम्हारा लक्ष्य तुम्हारे आसपास है, लेकिन तुम उससे दूर चलते हो। अन्य लोगों के पीछे दौड़ते रहते हो और तुम जो चाहते हो वह दूर हो जाता है।”
युवक ने विवेकानंद के उत्तर से संतुष्ट होकर अपनी गलती को सुधारने का निर्णय लिया।
*शिक्षा:-*
अपने लक्ष्य पर ध्यान रखो और भटकाने वाली चीज़ों से दूरी बनाओ।
भाग 3
*भाग्य की दौलत*
एक बार एक महात्मा जी निर्जन वन में भगवद्चिंतन के लिए जा रहे थे। तो उन्हें एक व्यक्ति ने रोक लिया।
वह व्यक्ति अत्यंत गरीब था। बड़ी मुश्किल से दो वक्त की रोटी जुटा पाता था। उस व्यक्ति ने महात्मा से कहा..
महात्मा जी, आप परमात्मा को जानते है, उनसे बातें करते है। अब यदि परमात्मा से मिले तो उनसे कहियेगा कि मुझे सारी उम्र में जितनी दौलत मिलनी है, कृपया वह एक साथ ही मिल जाये ताकि कुछ दिन तो में चैन से जी सकूँ।
महात्मा ने उसे समझाया – मैं तुम्हारी दुःख भरी कहानी परमात्मा को सुनाऊंगा लेकिन तुम जरा खुद भी सोचो, यदि भाग्य की सारी दौलत एक साथ मिल जायेगी तो आगे की ज़िन्दगी कैसे गुजारोगे ?
किन्तु वह व्यक्ति अपनी बात पर अडिग रहा। महात्मा उस व्यक्ति को आशा दिलाते हुए आगे बढ़ गए।
इन्हीं दिनों में उसे ईश्वरीय ज्ञान मिल चूका था। महात्मा जी ने उस व्यक्ति के लिए अर्जी डाली। परमात्मा की कृपा से कुछ दिनों बाद उस व्यक्ति को काफी धन – दौलत मिल गई। जब धन -दौलत मिल गई तो उसने सोचा,-मैंने अब तक गरीबी के दिन काटे है, ईश्वरीय सेवा कुछ भी नहीं कर पाया।
अब मुझे भाग्य की सारी दौलत एक साथ मिली है। क्यों न इसे ईश्वरीय सेवा में लगाऊँ क्योंकी इसके बाद मुझे दौलत मिलने वाली नहीं। ऐसा सोचकर उसने लगभग सारी दौलत ईश्वरीय सेवा में लगा दी।
समय गुजरता गया। लगभग दो वर्ष पश्चात् महात्मा जी उधर से गुजरे तो उन्हें उस व्यक्ति की याद आयी। महात्मा जी सोचने लगे – वह व्यक्ति जरूर आर्थिक तंगी में होगा क्योंकी उसने सारी दौलत एक साथ पायी थी। और कुछ भी उसे प्राप्त होगा नहीं। यह सोचते -सोचते महात्मा जी उसके घर के सामने पहुँचे।
लेकिन यह क्या ! झोपड़ी की जगह महल खड़ा था ! जैसे ही उस व्यक्ति की नज़र महात्मा जी पर पड़ी, महात्मा जी उसका वैभव देखकर आश्चर्य चकित हो गए। भाग्य की सारी दौलत कैसे बढ़ गई ?
वह व्यक्ति नम्रता से बोला, महात्माजी, मुझे जो दौलत मिली थी, वह मैंने चन्द दिनों में ही ईश्वरीय सेवा में लगा दी थी। उसके बाद दौलत कहाँ से आई – मैं नहीं जनता। इसका जवाब तो परमात्मा ही दे सकता है।
महात्मा जी वहाँ से चले गये। और एक विशेष स्थान पर पहुँच कर ध्यान मग्न हुए। उन्होंने परमात्मा से पूछा – यह सब कैसे हुआ ? महात्मा जी को आवाज़ सुनाई दी।
किसी की चोर ले जाये , किसी की आग जलाये
धन उसी का सफल हो जो ईश्वर अर्थ लगाये।
सीख – जो व्यक्ति जितना कमाता है उस में का कुछ हिस्सा अगर ईश्वरीय सेवा कार्य में लगता है तो उस का फल अवश्य मिलता है। इसलिए कहा गया है सेवा का फल तो मेवा है..!!
भाग 4
*गुरु -शिष्य*
बात कुछ इस तरह है, कि जब श्री रामकृष्ण परमहंस जी को कैंसर हुआ था, तब बीमारी के कारण वे खाना नहीं खा पाते थे, और स्वामी विवेकानंद जी अपने गुरु की इस हालात से बहुत ही चिंतित थे
एक दिन परमहंस जी ने पूछा- नरेंद्र (स्वामी विवेकानंद जी)! क्या तुझे वो दिन याद हैं, जब तू अपने घर से मेरे पास मंदिर में आता था, और तूने दो-दो दिनों से कुछ नहीं खाया होता था, परंतु तू अपनी मां से झूठ कह देता था कि तूने अपने मित्र के घर खाना खा लिया है, ताकि तेरी गरीब मां थोड़े-बहुत भोजन को तेरे छोटे भाई को परोस दे ….है ना?
स्वामी विवेकानंद जी ने रोते-रोते हां में सर हिला दिया।
परमहंस जी आगे बोले- और जब तू यहां मेरे पास मंदिर आता था, तो अपने चेहरे पर खुशी का मुखौटा पहन लेता था। लेकिन मैं भी तो कम नहीं था, झट जान जाता था कि तेरे पेट में चूहों का पूरा कबीला धमा-चौकड़ी मचा रहा है और तेरा शरीर भूख से चूर हो रहा है, और फिर तुझे अपने हाथों से लड्डू, पेड़े, मक्खन और मिश्री खिलाता था है ना?
स्वामी विवेकानंद जी ने सुबकते हुए हां में गर्दन हिलाई.
अब रामकृष्ण परमहंस जी फिर से मुस्कुराए और पूछा- कैसे जान लेता था मैं यह बात? कभी सोचा है तूने?
स्वामी विवेकानंद जी सिर उठाकर परमहंस जी को देखने लगे, और परमहंस जी ने फिर पूछा- बता न, मैं कैसे तेरी आंतरिक स्थिति को जान लेता था?
स्वामी विवेकानंद जी- क्योंकि आप अंतर्यामी हैं, ठाकुर।
परमहंस जी- अंतर्यामी, अंतर्यामी किसे कहते हैं?
स्वामी विवेकानंद जी- जो सबके अंदर की जान ले।
परमहंस जी- कोई अंदर की भावना कब जान सकता है?
स्वामी विवेकानंद जी- जब वो स्वयं अंदर में ही विराजमान हो।
परमहंस जी- यानि मैं तेरे अंदर भी बैठा हूं, है ना?
स्वामी विवेकानंद जी- जी बिल्कुल! आप मेरे हृदय में समाए हुए हैं।
परमहंस जी- तेरे भीतर में समाकर मैं हर बात जान लेता हूं, हर दुख-दर्द पहचान लेता हूं, तेरी भूख का अहसास कर लेता हूं, तो क्या तेरी भूख मुझ तक नहीं पहुंचती होगी?
स्वामी विवेकानंद जी- मेरी भूख आप तक?
रामकृष्ण परमहंस जी- हां तेरी भूख! जब तू भोजन खाता है और तुझे तृप्ति होती है, क्या वो मुझे तृप्त नहीं करती होगी? अरे पगले! गुरु अंतर्यामी है, अंतर-जगत का स्वामी है वो अपने शिष्य के भीतर बैठा सब कुछ भोगता है एक नहीं, हजारों मुखों से खाता हूं तेरे, लाटू के, काली के, गिरीश के, सबके याद रखना, गुरु कोई बाहर स्थित एक देह भर नहीं है वो तुम्हारे रोम-रोम का वासी है तुम्हें पूरी तरह आत्मसात कर चुका है अलगाव कहीं है ही नहीं अगर कल को मेरी यह देह नहीं रही, मैं तब भी जिऊंगा, तेरे जरिए जिऊंगा मैं तुझमें रहूंगा और तू मुझमें
ऐसा कहते हुए रामकृष्ण जी ने अपना जीवन त्याग दिया।।।।
*ऐसा होता है गुरु-शिष्य का रिश्ता*
भाग 5
*!! नेक कर्म !!*
एक राजा अपनी प्रजा का भरपूर ख्याल रखता था. राज्य में अचानक चोरी की शिकायतें बहुत आने लगीं. कोशिश करने से भी चोर पकड़ा नहीं गया.
हारकर राजा ने ढींढोरा पिटवा दिया कि जो चोरी करते पकडा जाएगा उसे मृत्युदंड दिया जाएगा. सभी स्थानों पर सैनिक तैनात कर दिए गए. घोषणा के बाद तीन-चार दिनों तक चोरी की कोई शिकायत नही आई.
उस राज्य में एक चोर था जिसे चोरी के सिवा कोई काम आता ही नहीं था. उसने सोचा मेरा तो काम ही चोरी करना है. मैं अगर ऐसे डरता रहा तो भूखा मर जाउंगा. चोरी करते पकडा गया तो भी मरुंगा, भूखे मरने से बेहतर है चोरी की जाए.
वह उस रात को एक घर में चोरी करने घुसा. घर के लोग जाग गए. शोर मचाने लगे तो चोर भागा. पहरे पर तैनात सैनिकों ने उसका पीछा किया. चोर जान बचाने के लिए नगर के बाहर भागा.
उसने मुडके देखा तो पाया कि कई सैनिक उसका पीछा कर रहे हैं. उन सबको चमका देकर भाग पाना संभव नहीं होगा. भागने से तो जान नहीं बचने वाली, युक्ति सोचनी होगी.
चोर नगर से बाहर एक तालाब किनारे पहुंचा. सारे कपडे उतारकर तालाब में फेंक दिया और अंधेरे का फायदा उठाकर एक बरगद के पेड के नीचे पहुंचा.
बरगद पर बगुलों का वास था. बरगद की जड़ों के पास बगुलों की बीट पड़ी थी. चोर ने बीट उठाकर उसका तिलक लगा लिया और आंख मूंदकर ऐसे स्वांग करने बैठा जैसे साधना में लीन हो.
खोजते-खोजते थोडी देर मे सैनिक भी वहां पहुंच गए पर उनको चोर कहीं नजर नहीं आ रहा था. खोजते खोजते उजाला हो रहा था ओर उनकी नजर बाबा बने चोर पर पडी.
सैनिकों ने पूछा- बाबा इधर किसी को आते देखा है. पर ढोंगी बाबा तो समाधि लगाए बैठा था. वह जानता था कि बोलूंगा तो पकडा जाउंगा सो मौनी बाबा बन गया और समाधि का स्वांग करता रहा.
सैनिकों को कुछ शंका तो हुई पर क्या करें. कही सही में कोई संत निकला तो ? आखिरकार उन्होंने छुपकर उसपर नजर रखना जारी रखा. यह बात चोर भांप गया. जान बचाने के लिए वह भी चुपचाप बैठा रहा.
एक दिन, दो दिन, तीन दिन बीत गए बाबा बैठा रहा. नगर में चर्चा शुरू हो गई की कोई सिद्ध संत पता नहीं कितने समय से बिना खाए-पीए समाधि लगाए बैठै हैं. सैनिकों को तो उनके अचानक दर्शऩ हुए हैं.
नगर से लोग उस बाबा के दर्शन को पहुंचने लगे. भक्तों की अच्छी खासी भीड़ जमा होने लगी. राजा तक यह बात पहुंच गई. राजा स्वयं दर्शन करने पहुंचे. राजा ने विनती की आप नगर मे पधारें और हमें सेवा का सौभाग्य दें.
चोर ने सोचा बचने का यही मौका है. वह राजकीय अतिथि बनने को तैयार हो गया. सब लोग जयघोष करते हुए नगर में ले जाकर उसकी सेवा सत्कार करने लगे.
लोगों का प्रेम और श्रद्धा भाव देखकर ढोंगी का मन परिवर्तित हुआ. उसे आभास हुआ कि यदि नकली में इतना मान-संम्मान है तो सही में संत होने पर कितना सम्मान होगा. उसका मन पूरी तरह परिवर्तित हो गया और चोरी त्यागकर संन्यासी हो गया.
*शिक्षा*
संगति, परिवेश और भाव इंसान में अभूतपूर्व बदलाव ला सकता है. रत्नाकर डाकू को गुरू मिल गए तो प्रेरणा मिली और वह आदिकवि हो गए. असंत भी संत बन सकता है, यदि उसे राह दिखाने वाला मिल जाए.
अपनी संगति को शुद्ध रखिए, विकारों का स्वतः पलायन आरंभ हो जाएगा..!!
भाग 6
*!! खुश रहने का रहस्य !!*
बहुत समय पहले की बात है, एक गाँव में एक महात्मा रहते थे। आसपास के गाँवों के लोग अपनी समस्याओं और परेशानियों के समाधान के लिए महात्मा के पास जाते थे। और संत उनकी समस्याओं, परेशानियों को दूर करके उनका मार्गदर्शन करते थे। एक दिन एक व्यक्ति ने महात्मा से पूछा – गुरुवर, संसार में खुश रहने का रहस्य क्या है ?
महात्मा ने उससे कहा कि तुम मेरे साथ जंगल में चलो, मैं तुम्हें खुश रहने का रहस्य बताता हूँ। उसके बाद महात्मा और वह व्यक्ति जंगल की तरफ चल दिए। रास्ते में चलते हुए महात्मा ने एक बड़ा सा पत्थर उठाया और उस व्यक्ति को देते हुए कहा कि इसे पकड़ो और चलो। उस व्यक्ति ने वह पत्थर लिया और वह महात्मा के साथ साथ चलने लगा।
कुछ देर बाद उस व्यक्ति के हाथ में दर्द होने लगा लेकिन वह चुप रहा और चलता रहा। जब चलते चलते बहुत समय बीत गया और उस व्यक्ति से दर्द सहा नहीं गया तो उसने महात्मा से कहा कि उसे बहुत दर्द हो रहा है। महात्मा ने कहा कि इस पत्थर को नीचे रख दो। पत्थर को नीचे रखते ही उस व्यक्ति को बड़ी राहत मिली।
तब महात्मा ने उससे पूछा – जब तुमने पत्थर को अपने हाथ में उठा रखा था तब तुम्हें कैसा लग रहा था। उस व्यक्ति ने कहा – शुरू में दर्द कम था तो मेरा ध्यान आप पर ज्यादा था, पत्थर पर कम था। लेकिन जैसे जैसे दर्द बढ़ता गया मेरा ध्यान आप पर से कम होने लगा और पत्थर पर ज्यादा होने लगा और एक समय मेरा पूरा ध्यान पत्थर पर आ गया और मैं इससे अलग कुछ नहीं सोच पा रहा था।
तब महात्मा ने उससे दोबारा पूछा – जब तुमने पत्थर को नीचे रखा तब तुम्हें कैसा महसूस हुआ।
इस पर उस व्यक्ति ने कहा – पत्थर नीचे रखते ही मुझे बहुत राहत महसूस हुई और ख़ुशी भी महसूस हुई।
तब महात्मा ने कहा कि यही है खुश रहने का रहस्य! इस पर वह व्यक्ति बोला – गुरुवर, मैं कुछ समझा नहीं।
तब महात्मा ने उसे समझाते हुए कहा – जिस तरह इस पत्थर को थोड़ी देर हाथ में उठाने पर थोड़ा सा दर्द होता है, थोड़ी और ज्यादा देर उठाने पर थोड़ा और ज्यादा दर्द होता है और अगर हम इसे बहुत देर तक उठाये रखेंगे तो दर्द भी बढ़ता जायेगा। उसी तरह हम दुखों के बोझ को जितने ज्यादा समय तक उठाये रखेंगे हम उतने ही दुखी और निराश रहेंगे। यह हम पर निर्भर करता है कि हम दुखों के बोझ को थोड़ी सी देर उठाये रखते हैं या उसे ज़िंदगी भर उठाये रहते हैं।
इसलिए अगर तुम खुश रहना चाहते हो तो अपने दुःख रुपी पत्थर को जल्दी से जल्दी नीचे रखना सीख लो और अगर संभव हो तो उसे उठाओ ही नहीं।
*शिक्षा:-*
यदि हमने अपने दुःख रुपी पत्थर को उठा रखा है तो शुरू शुरू में हमारा ध्यान अपने लक्ष्यों पर ज्यादा तथा दुखों पर कम होगा। लेकिन अगर हमने अपने दुःख रुपी पत्थर को लम्बे समय से उठा रखा है तो हमारा ध्यान अपने लक्ष्यों से हटकर हमारे दुखों पर आ जायेगा। और तब हम अपने दुखों के अलावा कुछ नहीं सोच पाएंगे और अपने दुखों में ही डूबकर परेशान होते रहेंगे और कभी भी खुश नहीं रह पाएंगे।
इसलिए अगर आपने भी कोई दुःख रुपी पत्थर उठा रखा है तो उसे जल्दी से जल्दी नीचे रखिये मतलब अपने दुखों को, तनाव को अपने दिलों दिमाग से निकाल फेंकिए और खुश रहिए तथा लक्ष्य को प्राप्त कीजिये..!!
भाग 7
*!! पेड़ों की समस्या !!*
एक राजा बहुत दिनों बाद अपने बगीचे में सैर करने गया, पर वहां पहुँच उसने देखा कि सारे पेड़-पौधे मुरझाए हुए हैं। राजा बहुत चिंतित हुआ, उसने इसकी वजह जानने के लिए सभी पेड़-पौधों से एक-एक करके सवाल पूछने लगा।
ओक वृक्ष ने कहा, वह मर रहा है क्योंकि वह देवदार जितना लंबा नहीं है। राजा ने देवदार की और देखा तो उसके भी कंधे झुके हुए थे क्योंकि वह अंगूर लता की भांति फल पैदा नहीं कर सकता था। अंगूर लता इसलिए मरी जा रही थी कि वह गुलाब की तरह खिल नहीं पाती थी।
राजा थोड़ा आगे गया तो उसे एक पेड़ नजर आया जो निश्चिंत था, खिला हुआ था और ताजगी में नहाया हुआ था।
राजा ने उससे पूछा, “बड़ी अजीब बात है, मैं पूरे बाग़ में घूम चुका लेकिन एक से बढ़कर एक ताकतवर और बड़े पेड़ दुखी हुई बैठे हैं लेकिन तुम इतने प्रसन्न नज़र आ रहे हो… ऐसा कैसे संभव है ?”
पेड़ बोला, “महाराज, बाकी पेड़ अपनी विशेषता देखने की बजाय स्वयं की दूसरों से तुलना कर दुखी हैं, जबकि मैंने यह मान लिया है कि जब आपने मुझे रोपित कराया होगा तो आप यही चाहते थे कि मैं अपने गुणों से इस बागीचे को सुन्दर बनाऊं, यदि आप इस स्थान पर ओक, अंगूर या गुलाब चाहते तो उन्हें लगवाते! इसीलिए मैं किसी और की तरह बनने की बजाय अपनी क्षमता के अनुसार श्रेष्ठतम बनने का प्रयास करता हूँ और प्रसन्न रहता हूँ।”
*शिक्षा:-*
हम अक्सर दूसरों से अपनी तुलना कर स्वयं को कम आंकने की गलती कर बैठते हैं। दूसरों की विशेषताओं से प्रेरित होने की बजाय हम अफ़सोस करने लगते हैं कि हम उन जैसे क्यों नहीं हैं।
हम सभी में कुछ ऐसी योग्यता है, जो अन्य लोगो में नहीं है। जरुरत है तो सिर्फ उसे पहचानने की और उस गुणवत्ता को और विकसित कर अपने क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने की। अगर हम यकीन कर ले की हम सफल हो सकते है, तो इससे दूसरे भी हम पर विश्वास करने लगते है। इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी खुद का मूल्यांकन कम करने की होती है। हमें अपनी कमिया पता होना अच्छी बात है। इनसे हमें यह पता चलता है की हमें किस क्षेत्र में सुधार करना है।
हमेशा अपने गुणों, अपनी योग्यताओं पर ध्यान केन्द्रित करें। यह जान लें, आप जितना समझते हैं, आप उससे कहीं बेहतर हैं। बड़ी सफलता उन्हीं लोगों का दरवाजा खटखटाती है जो लगातार खुद के सामने ऊंचे लक्ष्य रखते हैं, जो अपनी कार्यक्षमता सुधारना चाहते हैं।
भाग 8
*!! लालच बुरी बला है !!*
एक बार एक बुढ्ढा आदमी तीन गठरी उठा कर पहाड़ की चोटी की ओर बढ़ रहा था। रास्ते में उसके पास से एक हष्ट – पुष्ट नौजवान निकाला। बुढ्ढे आदमी ने उसे आवाज लगाई कि बेटा क्या तुम मेरी एक गठरी अगली पहाड़ी तक उठा सकते हो ? मैं उसके बदले इसमें रखी हुई पांच तांबे के सिक्के तुमको दूंगा। लड़का इसके लिए सहमत हो गया।
निश्चित स्थान पर पहुँचने के बाद लड़का उस बुढ्ढे आदमी का इंतज़ार करने लगा और बुढ्ढे आदमी ने उसे पांच सिक्के दे दिए। बुढ्ढे आदमी ने अब उस नौजवान को एक और प्रस्ताव दिया कि अगर तुम अगली पहाड़ी तक मेरी एक और गठरी उठा लो तो मैं उसमें रखी चांदी के पांच सिक्के और पांच पहली गठरी में रखे तांबे के पांच सिक्के तुमको और दूंगा।
नौजवान ने सहर्ष प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और पहाड़ी पर निर्धारित स्थान पर पहुँच कर इंतजार करने लगा। बुढ्ढे आदमी को पहुँचते-पहुँचते बहुत समय लग गया।
जैसे निश्चित हुआ था उस हिसाब से बुजुर्ग ने सिक्के नौजवान को दे दिये। आगे का रास्ता और भी कठिन था। बुजुर्ग व्यक्ति बोला कि आगे पहाड़ी और भी दुर्गम है। अगर तुम मेरी तीसरी सोने के मोहरों की गठरी भी उठा लो तो मैं तुमको उसके बदले पांच तांबे की मोहरे, पांच चांदी की मोहरे और पांच सोने की मोहरे दूंगा। नौजवान ने खुशी-खुशी हामी भर दी।
निर्धारित पहाड़ी पर पहुँचने से पहले नौजवान के मन में लालच आ गया कि क्यों ना मैं तीनों गठरी लेकर भाग जाऊँ। गठरियों का मालिक तो कितना बुजुर्ग है। वह आसानी से मेरे तक नहीं पहुंच पाएगा। अपने मन में आए लालच की वजह से उसने रास्ता बदल लिया।
कुछ आगे जाकर नौजवान के मन में सोने के सिक्के देखने की जिज्ञासा हुई। उसने जब गठरी खोली तो उसे देख कर दंग रह गया क्योंकि सारे सिक्के नकली थे।
उस गठरी में एक पत्र निकला। उसमें लिखा था कि जिस बुजुर्ग व्यक्ति की तुमने गठरी चोरी की है, वह वहाँ का राजा है।
राजा जी भेष बदल कर अपने कोषागार के लिए ईमानदार सैनिकों का चयन कर रहे हैं।
अगर तुम्हारे मन में लालच ना आता तो सैनिक के रूप में आज तुम्हारी भर्ती पक्की थी। जिसके बदले तुमको रहने को घर और अच्छा वेतन मिलता। लेकिन अब तुमको कारावास होगा क्योंकि तुम राजा जी का सामान चोरी करके भागे हो। यह मत सोचना कि तुम बच जाओगे क्योंकि सैनिक लगातार तुम पर नज़र रख रहे हैं।
अब नौजवान अपना माथा पकड़ कर बैठ गया। कुछ ही समय में राजा के सैनिकों ने आकर उसे पकड़ लिया।
उसके लालच के कारण उसका भविष्य जो उज्जवल हो सकता था, वह अंधकारमय हो चुका था। इसलिए कहते हैं लालच बुरी बला है..!!
*शिक्षा:-*
ज्यादा पाने की लालसा के कारण व्यक्ति लालच में आ जाता है और उसे जो बेहतरीन मिला होता है उसे भी वह खो देता है।
भाग 9
*!! पहले सोचें, घबराएं नहीं !!*
पुराने समय में एक व्यापारी ने किसी धनी साहूकार से पैसा उधार ब्याज पर लिया था लेकिन व्यापार में नुकसान हो जाने की वजह से वह साहूकार का पैसा लौटा नहीं पा रहा था।
व्यापारी की एक बेहद सुन्दर बेटी थी। साहूकार बड़ा कुटिल था। उसने सोचा कि व्यापारी पैसा तो वापस कर नहीं पा रहा है तो क्यों ना इसकी परिस्थिति का फायदा उठाया जाए! उसने व्यापारी को एक सुझाव दिया कि अगर वह अपनी बेटी की शादी उस साहूकार से कर दे तो वह व्यापारी का सारा कर्ज माफ़ कर देगा।
व्यापारी बेचारा मरता क्या ना करता, उसने अपनी बेटी को सारी बात बताई; समस्या बड़ी थी, साहूकार अधेड़ उम्र का कुरूप व्यक्ति था।
अब उस बेटी के आगे 2 ही रास्ते थे- पहला, या तो साहूकार से विवाह करने से इंकार कर दे और अपने पिता को कर्ज में दबा रहने दे। दूसरा, साहूकार से ख़ुशी से विवाह कर ले ताकि उसका पिता स्वतंत्रता से रह सके।
मित्रों, अक्सर हमारे जीवन में भी ऐसे मोड़ आते हैं जब हमें यकीन होने लगता है कि अब कोई रास्ता नहीं बचा है और अब हम बुरी तरह फंस चुके हैं अख़बारों में सुनने में आता है कि लोग आत्महत्या तक कर लेते हैं, लेकिन अपने दिमाग को पानी की तरह रखिये, एकदम निर्मल, शांत और चलायमान पानी को देखा है? पानी हर जगह से अपना रास्ता निकाल ही लेता है ठीक वैसे ही बन जाओ।
आगे देखिये लड़की ने क्या फैसला लिया- लड़की ने साहूकार के आगे एक शर्त रखी कि साहूकार एक थैला लाये और उसमें दो गोलियां डाले, एक सफ़ेद रंग की तथा दूसरी काले रंग की। इसके बाद लड़की उस थैले से आँख बंद करके कोई एक गोली निकालेगी।
गोली अगर काली निकली तो लड़की साहूकार से विवाह कर लेगी और उसके पिता का कर्ज माफ़ कर दिया जायेगा।
साथ ही, अगर गोली सफ़ेद निकली तो भी पिता कर कर्ज माफ़ किया जायेगा लेकिन लड़की साहूकार से विवाह नहीं करेगी।
साहूकार तुरंत बात मान गया और जल्द ही एक थैला लेकर आ गया। अब वह जब थैले में गोलियां डाल रहा था तो लड़की ने देखा कि साहूकार ने चालाकी से दोनों गोली काली ही थैली में डाल दीं है।
अब लड़की परेशान हो गयी कि अब वह करे तो क्या करे, साहूकार का भांडा फोड़ भी दे तो भी वह दूसरी किसी चाल में उनको जरूर फंसाएगा।
लड़की कुछ सोचकर आगे बढ़ी और उसने थैले से एक गोली निकाली और गोली बाहर निकालते ही, उसे हाथ से छिटका दी, जिससे गोली नाली में जा गिरी।
लड़की बोली- माफ़ करना, गोली मेरे हाथ से छिटक गयी लेकिन चिंता की कोई बात नहीं, थैले में अभी दूसरी गोली भी तो होगी उसे देख लेते हैं अगर गोली काली निकली तो मैंने सफ़ेद गोली उठायी होगी और थैले में गोली सफ़ेद निकली तो मैंने काली गोली उठाई होगी।
व्यापारी ने थैले में हाथ डाला तो देखा, काली गोली निकली।
व्यापारी बोला- अहा, बेटी थैले में काली गोली बची है इसका मतलब तुमने सफ़ेद गोली चुनी थी।
साहूकार बेचारा बोलता भी क्या? अगर बोलता तो चोरी पकड़ी जाती। इस प्रकार पिता का कर्ज भी माफ़ हो गया और बेटी ने अपनी रक्षा भी कर ली।
जब तक आप समस्याओं के समाधान के बारे में नहीं सोचेंगे तब तक आप समस्याओं में ही उलझे रहेंगे।
*शिक्षा:-*
अपने विचारों को खुलने दें, थोड़ा हटकर सोचें, यह सोचें कि हर समस्या का हल है तो मेरी समस्या का भी कोई ना कोई हल जरूर होगा। जब आप ऐसा सोचने लगेंगे तो यकीन मानिये आपको समस्याओं के हल भी मिलना शुरू हो जायेंगे।
भाग 10
*!! लक्ष्य प्राप्ति की राह !!*
एक किसान के घर एक दिन उसका कोई परिचित मिलने आया। उस समय वह घर पर नहीं था। उसकी पत्नी ने कहा- वह खेत पर गए हैं। मैं बच्चे को बुलाने के लिए भेजती हूं। तब तक आप इंतजार करें।
कुछ ही देर में किसान खेत से अपने घर आ पहुंचा। उसके साथ-साथ उसका पालतू कुत्ता भी आया। कुत्ता जोरों से हांफ रहा था। उसकी यह हालत देख, मिलने आए व्यक्ति ने किसान से पूछा… क्या तुम्हारा खेत बहुत दूर है ? किसान ने कहा- नहीं, पास ही है। लेकिन आप ऐसा क्यों पूछ रहे हैं ?
उस व्यक्ति ने कहा- मुझे यह देखकर आश्चर्य हो रहा है कि तुम और तुम्हारा कुत्ता दोनों साथ-साथ आए… लेकिन तुम्हारे चेहरे पर रंच मात्र थकान नहीं जबकि कुत्ता बुरी तरह से हांफ रहा है।
किसान ने कहा- मैं और कुत्ता एक ही रास्ते से घर आए हैं। मेरा खेत भी कोई खास दूर नहीं है। मैं थका नहीं हूं। मेरा कुत्ता थक गया है। इसका कारण यह है कि मैं सीधे रास्ते से चलकर घर आया हूं, मगर कुत्ता अपनी आदत से मजबूर है।
वह आसपास दूसरे कुत्ते देखकर उनको भगाने के लिए उसके पीछे दौड़ता था और भौंकता हुआ वापस मेरे पास आ जाता था। फिर जैसे ही उसे और कोई कुत्ता नजर आता, वह उसके पीछे दौड़ने लगता। अपनी आदत के अनुसार उसका यह क्रम रास्ते भर जारी रहा। इसलिए वह थक गया है।
देखा जाए तो यही स्थिति आज के इंसान की भी है।
जीवन के लक्ष्य तक पहुंचना यूं तो कठिन नहीं है, लेकिन राह में मिलने वाले कुत्ते, व्यक्ति को उसके जीवन की सीधी और सरल राह से भटका रहे हैं।
इंसान अपने लक्ष्य से भटक रहा है और यह भटकाव ही इंसान को थका रहा है। यह लक्ष्य प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा है। आपकी ऊर्जा को रास्ते में मिलने वाले कुत्ते बर्बाद करते हैं।
भौंकने दो इन कुत्तों को और लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में सीधे बढ़ते रहो.. फिर एक ना एक दिन मंजिल मिल ही जाएगी। लेकिन इनके चक्कर में पड़ोगे तो थक ही जाओगे। अब ये आपको सोचना है कि किसान की तरह सीधी राह चलना है या उसके कुत्ते की तरह।
*शिक्षा:-*
सफलता के लिए सही समय की नहीं, सही निर्णय की जरूरत होती है।
प्रेम दुर्लभ है उसे पकड़ कर रखें, क्रोध बहुत खराब है, उसे दबाकर रखें। भय बहुत भयानक है, उसका सामना करें, स्मृतियाँ बहुत सुखद है उन्हें संजोकर रखें।
भाग 11
*समर्पण और अहंकार*
*पेड़ की सबसे ऊँची डाली पर लटक रहा नारियल रोज नीचे नदी मे पड़े पत्थर पर हंसता और कहता।*
*तुम्हारी तकदीर मे भी बस एक जगह पड़े रह कर,नदी की धाराओँ के प्रवाह को सहन करना ही लिखा है,देखना एक दिन यूं ही पड़े पड़े घिस जाओगे।*
*मुझे देखो कैसी शान से उपर बैठा हूं? पत्थर रोज उसकी अहंकार भरी बातोँ को अनसुना कर देता।*
*समय बीता एक दिन वही पत्थर घिस घिस कर गोल हो गया और विष्णु प्रतीक शालिग्राम के रूप मे जाकर, एक मन्दिर मे प्रतिष्ठित हो गया ।*
*एक दिन वही नारियल उन शालिग्राम जी की पूजन सामग्री के रूप मे मन्दिर मे लाया गया।*
*शालिग्राम ने नारियल को पहचानते हुए कहा ” भाई . देखो घिस घिस कर परिष्कृत होने वाले ही प्रभु के प्रताप से, इस स्थिति को पहुँचते है।*
*सबके आदर का पात्र भी बनते है,जबकि अहंकार के मतवाले अपने ही दभं के डसने से नीचे आ गिरते है।*
*तुम जो कल आसमान मे थे,आज से मेरे आगे टूट कर,कल से सड़ने भी लगोगे,पर मेरा अस्तित्व अब कायम रहेगा।*
*भगवान की दृष्टि मे मूल्य.. समर्पण का है.अहंकार का नहीं..!!*
भाग 12
1️⃣2️⃣❗1️⃣1️⃣❗2️⃣0️⃣2️⃣4️⃣
*🌷!! समय का सदुपयोग !!*
किसी गांव में एक व्यक्ति रहता था। वह बहुत ही भला था लेकिन उसमें एक दुर्गुण था वह हर काम को टाला करता था। वह मानता था कि जो कुछ होता है भाग्य से होता है।
एक दिन एक साधु उसके पास आया। उस व्यक्ति ने साधु की बहुत सेवा की। उसकी सेवा से खुश होकर साधु ने पारस पत्थर देते हुए कहा- मैं तुम्हारी सेवा से बहुत प्रसन्न हूं। इसलिय मैं तुम्हे यह पारस पत्थर दे रहा हूं। सात दिन बाद मै इसे तुम्हारे पास से ले जाऊंगा। इस बीच तुम जितना चाहो, उतना सोना बना लेना।
उस व्यक्ति को लोहा नही मिल रहा था। अपने घर में लोहा तलाश किया। थोड़ा सा लोहा मिला तो उसने उसी का सोना बनाकर बाजार में बेच दिया और कुछ सामान ले आया।
अगले दिन वह लोहा खरीदने के लिए बाजार गया, तो उस समय मंहगा मिल रहा था यह देख कर वह व्यक्ति घर लौट आया।
तीन दिन बाद वह फिर बाजार गया तो उसे पता चला कि इस बार और भी महंगा हो गया है। इसलिए वह लोहा बिना खरीदे ही वापस लौट गया।
उसने सोचा-एक दिन तो जरुर लोहा सस्ता होगा। जब सस्ता हो जाएगा तभी खरीदेंगे। यह सोचकर उसने लोहा खरीदा ही नहीं।
आठवें दिन साधु पारस लेने के लिए उसके पास आ गए। व्यक्ति ने कहा- मेरा तो सारा समय ऐसे ही निकल गया। अभी तो मैं कुछ भी सोना नहीं बना पाया। आप कृपया इस पत्थर को कुछ दिन और मेरे पास रहने दीजिए। लेकिन साधु राजी नहीं हुए।
साधु ने कहा-तुम्हारे जैसा आदमी जीवन में कुछ नहीं कर सकता। तुम्हारी जगह कोई और होता तो अब तक पता नहीं क्या-क्या कर चुका होता। जो आदमी समय का उपयोग करना नहीं जानता, वह हमेशा दु:खी रहता है। इतना कहते हुए साधु महाराज पत्थर लेकर चले गए।
*शिक्षा:-*
जो व्यक्ति काम को टालता रहता है, समय का सदुपयोग नहीं करता और केवल भाग्य भरोसे रहता है वह हमेशा दुःखी रहता है।
भाग 13
*राजा का स्वप्न और शब्दों की शक्ति*
एक बार की बात है, एक राजा ने रात में एक विचित्र स्वप्न देखा। उसने देखा कि उसके सारे दाँत टूट गए हैं, बस सामने का एक बड़ा दाँत बचा हुआ है। सुबह होते ही राजा चिंतित हो उठा और अपने दरबार में जाकर स्वप्न का फल जानने की इच्छा जताई।
राजा के मंत्रियों ने सुझाव दिया कि राज्य के स्वप्न विशेषज्ञों को बुलाया जाए और स्वप्न का फलादेश पूछा जाए। राज्यभर में घोषणा की गई कि जो भी राजा के स्वप्न का सही फल बताएगा, उसे उचित इनाम दिया जाएगा। कई विद्वान दरबार में आए, लेकिन कोई भी राजा को संतुष्ट नहीं कर सका।
एक दिन, काशी से विद्या प्राप्त एक विद्वान दरबार में आया और राजा से कहा, “महाराज, मैं आपके स्वप्न का सही फल बता सकता हूँ।”
राजा ने उत्सुकता से उसे अपना स्वप्न सुनाया। विद्वान ने गहरी सोच के बाद कहा, “महाराज, आपका स्वप्न बहुत अशुभ है। इसके फलस्वरूप आपके परिवार के सभी सदस्य आपके सामने ही मर जाएंगे और अंत में आपकी मृत्यु होगी।”
राजा यह सुनकर क्रोधित हो गया और विद्वान को तुरंत जेल में डालने का आदेश दिया।
अगले दिन, एक साधारण व्यक्ति दरबार में आया और राजा से कहा, “महाराज, कृपया मुझे अपना स्वप्न बताइए, मैं उसका फल जानने की कोशिश करूंगा।”
राजा ने पुनः अपना स्वप्न सुनाया।
व्यक्ति ने थोड़ी देर सोचने के बाद कहा, “महाराज, यह स्वप्न बहुत शुभ है। इसका अर्थ है कि हम सभी प्रजा जन पर ईश्वर की विशेष कृपा है कि आप जैसे धर्मात्मा, पुण्यात्मा और प्रजापालक राजा को दीर्घायु (लंबी आयु) दी हैं। राजन आपके परिवार में आपकी आयु सबसे लंबी होगी। इस राज्य का यह सौभाग्य है कि आप कई वर्षो तक राज्य करेगें।”
राजा इस फलादेश को सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुआ और उस साधारण व्यक्ति को विशेष सम्मान के साथ बहुत सारा धन-दौलत इनाम में दिया।
यद्यपि दोनों ही व्यक्तियों ने स्वप्न का एक ही फलादेश दिया था, लेकिन पहले व्यक्ति को बंदी बनाकर जेल में डाल दिया गया, जबकि दूसरे को सम्मानित किया गया। *क्यों?*
क्योंकि पहले व्यक्ति ने, भले ही वह विद्वान था, अपने शब्दों का चयन ठीक से नहीं किया और अपने उत्तर में कठोर और अशुभ शब्दों का प्रयोग किया।
वहीं दूसरा व्यक्ति, जो साधारण था, उसने अपने शब्दों का चयन बहुत सोच-समझकर किया और अपने उत्तर में सकारात्मक और सजीव भाषा का प्रयोग किया।
_*सीख: इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि हमारी बोलचाल, बातचीत और व्यवहार में शब्दों का विशेष महत्व होता है। सही और सम्मानजनक शब्दों के प्रयोग से हमारे संवाद में मिठास आती है, जिससे दुश्मनों के दिलों में भी प्यार जगाया जा सकता है। वहीं, गलत और कठोर शब्दों का प्रयोग हमारे अपनों के दिलों में भी नफरत और दूरी पैदा कर सकता है। इसलिए, हमेशा सोच-समझकर और सम्मानजनक शब्दों का प्रयोग करें।*
भाग 14
*सच्ची मित्रता*
एक बार की बात है, दो दोस्त थे – राम और श्याम। दोनों बहुत अच्छे मित्र थे और हमेशा एक-दूसरे की मदद करते थे। एक दिन, वे जंगल में घूमने गए। अचानक, उन्हें एक भालू दिखाई दिया। राम तुरंत एक पेड़ पर चढ़ गया, लेकिन श्याम को चढ़ना नहीं आता था। श्याम ने सुना था कि भालू मरे हुए लोगों को नहीं छूते, इसलिए वह जमीन पर लेट गया और सांस रोक ली।
भालू श्याम के पास आया, उसे सूंघा और चला गया। राम ने पेड़ से उतरकर श्याम से पूछा, “भालू ने तुम्हारे कान में क्या कहा?” श्याम ने उत्तर दिया, “भालू ने कहा कि सच्चे मित्र वही होते हैं जो मुसीबत में साथ देते हैं।”
*शिक्षा*: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि सच्ची मित्रता वही होती है जो कठिन समय में भी साथ निभाए। सच्चे मित्र हमेशा एक-दूसरे की मदद करते हैं और कभी भी एक-दूसरे को अकेला नहीं छोड़ते।
भाग 15
*!! कड़वा वचन !!*
सुंदर नगर में एक सेठ रहते थे। उनमें हर गुण था- नहीं था तो बस खुद को संयत में रख पाने का गुण। जरा-सी बात पर वे बिगड़ जाते थे। आसपास तक के लोग उनसे परेशान थे। खुद उनके घर वाले तक उनसे परेशान होकर बोलना छोड़ देते।
किंतु, यह सब कब तक चलता। वे पुन: उनसे बोलने लगते। इस प्रकार काफी समय बीत गया, लेकिन सेठ की आदत नहीं बदली। उनके स्वभाव में तनिक भी फर्क नहीं आया।
अंततः एक दिन उसके घरवाले एक साधु के पास गये और अपनी समस्या बताकर बोले- “महाराज ! हम उनसे अत्यधिक परेशान हो गये हैं, कृपया कोई उपाय बताइये।” तब, साधु ने कुछ सोचकर कहा- “सेठ जी ! को मेरे पास भेज देना।”
“ठीक है, महाराज” कहकर सेठ जी के घरवाले वापस लौट गये। घर जाकर उन्होंने सेठ जी को अलग-अलग उपायों के साथ उन्हें साधु महाराज के पास ले जाना चाहा। किंतु, सेठ जी साधु-महात्माओं पर विश्वास नहीं करते थे। अतः वे साधु के पास नहीं आये। तब एक दिन साधु महाराज स्वयं ही उनके घर पहुंच गये। वे अपने साथ एक गिलास में कोई द्रव्य लेकर गये थे।
साधु को देखकर सेठ जी की प्योरिया चढ़ गयी। परंतु घरवालों के कारण वे चुप रहे।
साधु महाराज सेठ जी से बोले- “सेठ जी ! मैं हिमालय पर्वत से आपके लिए यह पदार्थ लाया हूं, जरा पीकर देखिये।” पहले तो सेठ जी ने आनाकानी की, परंतु फिर घरवालों के आग्रह पर भी मान गये। उन्होंने द्रव्य का गिलास लेकर मुंह से लगाया और उसमें मौजूद द्रव्य को जीभ से चाटा।
ऐसा करते ही उन्होंने सड़ा-सा मुंह बनाकर गिलास होठों से दूर कर लिया और साधु से बोले- “यह तो अत्यधिक कड़वा है, क्या है यह ?”
“अरे आपकी जबान जानती है कि कड़वा क्या होता है” साधु महाराज ने कहा। “यह तो हर कोई जानता है” कहते समय सेठ ने रहस्यमई दृष्टि से साधु की ओर देखा।
“नहीं ऐसा नहीं है, अगर हर कोई जानता होता तो इस कड़वे पदार्थ से कहीं अधिक कड़वे शब्द अपने मुंह से नहीं निकालता। सेठ जी वह एक पल को रुके फिर बोले। सेठ जी याद रखिये जो आदमी कटु वचन बोलता है वह दूसरों को दुख पहुंचाने से पहले, अपनी जबान को गंदा करता है।”
सेठ समझ गये थे कि साधु ने जो कुछ कहा है उन्हें ही लक्षित करके कहा है। वह फौरन साधु के पैरों में गिर पड़े- “बोले साधु महाराज ! आपने मेरी आंखें खोल दी, अब मैं आगे से कभी कटु वचनों का प्रयोग नहीं करूंगा।”
सेठ के मुंह से ऐसे वाक्य सुनकर उनके घरवाले प्रसन्नता से भर उठे। तभी सेठ जी ने साधु से पूछा- “किंतु, महाराज! यह पदार्थ जो आप हिमालय से लाये हो वास्तव में यह क्या है?”
साधु मुस्कुराकर बोले- “नीम के पत्तों का अर्क।” “क्या” सेठ जी के मुंह से निकला और फिर वे धीरे-से मुस्कुरा दिये।
*शिक्षा:-*
मित्रों! कड़वा वचन बोलने से बढ़कर इस संसार में और कड़वा कुछ नहीं। किसी द्रव्य के कड़वे होने से जीभ का स्वाद कुछ ही देर के लिए कड़वा होता है। परंतु कड़वे वचन से तो मन और आत्मा को चोट लगती है..!!
भाग 16
*!! योग्यता का पुरस्कार !!*
एक राजा के राज सभा में एक अनजान व्यक्ति नौकरी मांगने के लिए आया। उससे उसकी योग्यता पूछी गई, तो वो बोला- “मैं, आदमी हो चाहे जानवर, शक्ल देख कर उसके बारे में बता सकता हूँ।”
राजा ने उसे अपने खास “घोड़ों के अस्तबल का इंचार्ज” बना दिया। कुछ दिनों बाद राजा ने उससे अपने सबसे महंगे और मनपसन्द घोड़े के बारे में पूछा। उसने कहा, “महाराज, ये घोड़ा नस्ली नही हैं।”
राजा को हैरानी हुई, उसने जंगल से तुरंत घोड़े वाले को बुला कर पूछा। उसने बताया, घोड़ा नस्ली तो है; पर इसकी पैदाइश पर इसकी मां मर गई थी, ये एक गाय का दूध पीकर उसके साथ पला है।
राजा ने अपने नौकर को बुलाया और पूछा… “तुमको कैसे पता चला कि घोड़ा नस्ली नहीं है?” उसने कहा- “जब ये घास खाता है तो गायों की तरह सर नीचे करके, जबकि नस्ली घोड़ा घास मुँह में लेकर सर उठा लेता है।”
राजा उसकी योग्यता से अत्यंत प्रसन्न हुए, और नौकर के घर अनाज, घी, मुर्गे और अंडे बतौर पुरुस्कार भिजवा दिए और उसे अपने महल में तैनात कर दिया।
कुछ दिनों बाद, राजा ने उससे रानी के बारे में राय मांगी। उसने कहा, “तौर तरीके तो रानी जैसे हैं लेकिन पैदाइशी नहीं हैं।” राजा के पैरों तले जमीन निकल गई, उसने अपनी सास को बुलाया, मामला उसको बताया। सास ने कहा- “वास्तविकता ये हैं कि आपके पिताजी ने मेरे पति से हमारी बेटी की पैदाइश पर ही रिश्ता मांग लिया था, लेकिन हमारी बेटी ६ माह में ही मर गई थी। इसलिए हमने आपके रजवाड़े से नजदीकी रखने के लिए किसी और की बच्ची को अपनी बेटी बना लिया।”
राजा ने फिर अपने नौकर से पूछा- “तुमको कैसे पता चला?”
उसने कहा, “रानी साहिबा का नौकरों के साथ व्यहवार गंवारों से भी बुरा है। एक खानदानी व्यक्ति का दूसरों से व्यवहार करने का एक तरीका होता है, जो रानी साहिबा में बिल्कुल नहीं है।
राजा फिर उसकी पारखी नज़रों से खुश हुआ और बहुत से अनाज, भेड़-बकरियां बतौर पुरुस्कार दीं। साथ ही उसे अपने दरबार में तैनात कर दिया। कुछ समय बीता, राजा ने फिर नौकर को बुलाया और अपने खुद के बारे में पूछा।
नौकर ने कहा – “जान की सलामती हो तो कहूँ।” राजा ने वादा किया। उसने कहा- “न तो आप राजा के बेटे हो और न ही आपका चलन राजाओं वाला है।”
राजा को बहुत गुस्सा आया, मगर जान की सलामती का वचन दे चुका था, राजा सीधा अपनी मां के महल पहुँचा।
मां ने कहा- “ये सच है, तुम एक चरवाहे के बेटे हो, हमारी औलाद नहीं थी तो तुम्हें गोद लेकर हमने पाला।”
राजा ने नौकर को बुलाया और पूछा – बता, “तुझे कैसे पता चला?”
उसने कहा- “जब राजा किसी को इनाम दिया करते हैं, तो हीरे-मोती और जवाहरात की शक्ल में देते हैं… लेकिन आप भेड़, बकरियां, खाने-पीने की चीजें दिया करते हैं… ये रवैया किसी राजाओं का नहीं, किसी चरवाहे के बेटे का ही हो सकता है।”
राजा हैरान रह गया..!!
*शिक्षा:-*
किसी इंसान के पास कितनी धन-दौलत, सुख-समृद्धि, प्रसिद्धि, बाहुबल हैं; ये सब बाहरी दिखावा हैं। इंसान की असलियत की पहचान उसके व्यवहार और उसकी सोच से होती है..!!
भाग 17
*🌷ऋषि की शक्ति*
एक ऋषि जंगल में रहते थे। वह बहुत शक्तिशाली बनने के लिए जंगल में एक पेड़ के नीचे बैठकर बरसों से तपस्या कर रहे थे। भगवान उनकी तपस्या से खुश होकर आशीर्वाद के रूप में उन्हें कई शक्तियां दी। जिनका वे आवश्यकता के समय उपयोग कर सकते थे।ऋषि बहुत ही विनम्र व्यक्ति थे, लेकिन भगवान से कुछ शक्तियां प्राप्त करने के बाद उन्हें खुद पर गर्व होने लगा।जंगल से लौटने के बाद वह गांव में अपने घर चले गए। एक दिन किसी काम के लिए उन्हें शहर जाना था। बीच में एक नदी थी, जिसे शहर जाने के लिए पार करना पड़ता था।नदी पार करने के लिए नदी के दोनों किनारों पर नावें और नावें चलाने वाले उपलब्ध थे। ऋषि वहां पहुंचे और फिर नाव किराए पर लेने के लिए नाव वाले के पास गए। तभी उन्होंने एक दूसरे ऋषि को नदी के उस पार पेड़ के नीचे बैठकर ध्यान करते देखा। ऋषि ने शक्ति प्राप्त कर लिया था और वहां बैठे ऋषि को अपनी शक्ति दिखाना चाहते थे।ऋषि ने अपनी शक्ति का उपयोग किया और जल्द ही नदी के उस पार चले गए। फिर उस ऋषि के पास गए जो नदी के किनारे बैठकर तपस्या कर रहे थे।
ऋषि ने गर्व से कहा, “क्या तुमने देखा? मैंने इस नदी पर चलने के लिए कैसे अपनी शक्ति का प्रयोग किया। क्या आप ऐसा कर सकते हैं?”
दूसरा ऋषि ने उत्तर दिया, “हां, मैं ऐसा कर सकता हूं। लेकिन क्या आपको ऐसा नहीं लगता, एक छोटी सी नदी पार करने के लिए आप अपनी मूल्यवान शक्ति को नष्ट कर रहे हो।जब आप किसी जरूरतमंद की मदद करने के लिए और दूसरों के अच्छा करने के लिए उसी शक्ति का प्रयोग कर सकते थे।” फिर भी आपने इस नदी को पार करने के लिए अपनी मूल्यवान शक्ति का प्रयोग किया। आप वहां खड़े नाव वाले को कुछ पैसा देकर नदी पार कर सकते थे।”
ऋषि को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने उनसे माफी मांगी। दूसरा ऋषि, उस ऋषि को अपनी गलती का एहसास करने के लिए धन्यवाद दिया।
*👉शिक्षा:-*
साथियों, अगर हम किसी शक्ति को हासिल करते हैं। तो हमें शक्ति का प्रयोग सिर्फ दिखावे के लिए करने के बजाए, दूसरे की मदद करने के लिए करना चाहिए।
भाग 18
*🌷मौत और मोक्ष*
सीधी, साफ बात है! थोड़ी कड़वी जरूर है, पर बड़े काम की है। और वैसे भी बच्चों को ही दवाई चीनी में लपेट कर दी जाती है, आप बच्चे थोड़े हैं, आप तो बड़े हैं, और बड़े तो कितनी भी कड़वी दवा हो सीधा ही गटक जाते हैं।
देखो, देह के तल पर जीने वाला, कमाना, खाना और पैखाना ही जिसके जीवन का लक्ष्य है, जीता तो नकली है ही, मरता भी नकली है। कोई कहे कि मरना तो मरना है, क्या मरने में भी कोई असली नकली होता है? हाँ!
अपने परिवार, पास पड़ोस वालों की नजर में मर जाना, और चुपके से कहीं दूसरे घर में जाकर पैदा हो जाना, यह नकली मरना नहीं है? हमने तो सोचा मर गया, पर मरा वरा कुछ नहीं, कपड़ा बदल कर कहीं और रहने लगा, यह नकली मरना ही तो है।
“जाता नहीं है कोई दुनिया से कहीं चलके।
मिलते हैं सब यहीं पे कपड़े बदल बदल के॥”
वैसे इसमें वह मरने वाला कुछ और करता भी कैसे? स्वयं पूरा जीवन धोखे में जीता जीते, उसे धोखे का अभ्यास जो हो गया। वह था कुछ और, पर कुछ और होकर जीता रहा। था अविनाशी आत्मा, पर अपने को मरणधर्मा देह मानकर ही उसने अपना सारा जीवन बिता दिया। जो जीते जी अपने आप को ही धोखा देता रहा, मरते समय औरों को धोखा न देता तो क्या करता?
ध्यान दें, नकली मरना मौत कहलाता है, असली मरना मोक्ष कहलाता है। मौत माने बार बार जन्मना, बार बार मरना। मोक्ष माने सदा सदा के लिए जन्मने मरने से छुट्टी। तन का मरना मौत है, मन का मरना मोक्ष है। मन के रहते तन का मर जाना मौत है, तन के रहते मन का मर जाना मोक्ष।
अरे साधकों! जितना समय बीत गया सो तो बीत ही गया, पर अभी भी वक्त है, संभल जाओ। जीवन तो धोखे में चला ही गया है, कम से कम मर तो असली जाओ। जीते जी ही मन से मर जाओ। तब आपके माथे पर “धोखेबाज़” का कलंक नहीं होगा..!!
भाग 19
*!! अनुशासन के बिना विकास नहीं !!*
प्राचीन समय में एक नगर था। वहां एक मठ था। उस मठ में एक वरिष्ठ भिक्षु रहते थे। उनके पास अनेकों सिद्धियां थीं, जिसके चलते उनका सम्मान होता था। सम्मान बहुत बड़ी चीज होती है ये वो जानते थे। इसलिए उनकी महत्वाकांक्षा और कुछ न थी।
एक दिन दोपहर के समय वह अपने शिष्यों के साथ ध्यान कर रहे थे। अन्य भिक्षु शिष्य भूखे थे। तब वरिष्ठ भिक्षु ने कहा, ‘क्या तुम भूखे हो?’ वह भिक्षु बोला, ‘यदि हम भूखे भी हों तो क्या?’ मठ के नियम के अनुसार दोपहर में भोजन नहीं कर सकते हैं।
वरिष्ठ भिक्षु बोले, ‘तुम चिंता मत करो मेरे पास कुछ फल हैं।’ उन्होंने वह फल शिष्य भिक्षु को दे दिए। उसी मठ में एक अन्य भिक्षु थे वह मठ के नियमों को लेकर जागरुक रहते थे। वह एक सिद्ध पुरुष थे। लेकिन ये बात उनके सिवाय और कोई नहीं जानता था।
अगले दिन उन्होंने घोषणा की कि जिसने भी भूख के कारण मठ का नियम तोड़ा है। उसे मठ से निष्काषित किया जाता है। तब उन वरिष्ठ भिक्षु ने अपना चोंगा उतारा और हमेशा के लिए उस मठ से चले गए।
*शिक्षा:-*
अनुशासन के बिना सच्ची प्रगति संभव नहीं है। वरिष्ठ भिक्षु ने ऐसा ही किया। दरअसल यह याद रखना हमेशा जरूर है कि जीवन में जो सफलता या शक्ति हासिल हुई है, वह कठोर अनुशासन के फलस्वरूप ही मिलती है।
भाग 20
*!! सबसे बड़ा गुण !!*
एक राजा को अपने लिए सेवक की आवश्यकता थी। उसके मंत्री ने दो दिनों के बाद एक योग्य व्यक्ति को राजा के सामने पेश किया। राजा ने उसे अपना सेवक बना तो लिया पर बाद में मंत्री से कहा, ‘‘वैसे तो यह आदमी ठीक है पर इसका रंग-रूप अच्छा नहीं है।’’ मंत्री को यह बात अजीब लगी पर वह चुप रहा।
एक बार गर्मी के मौसम में राजा ने उस सेवक को पानी लाने के लिए कहा। सेवक सोने के पात्र में पानी लेकर आया। राजा ने जब पानी पिया तो पानी पीने में थोड़ा गर्म लगा। राजा ने कुल्ला करके फेंक दिया। वह बोला, ‘‘इतना गर्म पानी, वह भी गर्मी के इस मौसम में, तुम्हें इतनी भी समझ नहीं।’’ मंत्री यह सब देख रहा था। मंत्री ने उस सेवक को मिट्टी के पात्र में पानी लाने को कहा। राजा ने यह पानी पीकर तृप्ति का अनुभव किया।
इस पर मंत्री ने कहा, ‘‘महाराज, बाहर को नहीं, भीतर को देखें। सोने का पात्र सुंदर, मूल्यवान और अच्छा है, लेकिन शीतलता प्रदान करने का गुण इसमें नहीं है। मिट्टी का पात्र अत्यंत साधारण है लेकिन इसमें ठंडा बना देने की क्षमता है। कोरे रंग-रूप को न देखकर गुण को देखें।’’ उस दिन से राजा का नजरिया बदल गया।
सम्मान, प्रतिष्ठा, यश, श्रद्धा पाने का अधिकार चरित्र को मिलता है, चेहरे को नहीं। चाणक्य ने कहा है कि मनुष्य गुणों से उत्तम बनता है न कि ऊंचे आसन पर बैठने से या पदवी से। जैसे ऊंचे महल के शिखर पर बैठ कर भी कौवा, कौवा ही रहता है; गरुड़ नहीं बन जाता। उसी तरह अमिट सौंदर्य निखरता है मन की पवित्रता से, क्योंकि सौंदर्य रंग-रूप, नाक-नक्श, चाल-ढाल, रहन-सहन, सोच-शैली की प्रस्तुति मात्र नहीं होता। यह व्यक्ति के मन, विचार, चिंतन और कर्म का आइना है। कई लोग बाहर से सुंदर दिखते हैं मगर भीतर से बहुत कुरूप होते हैं। जबकि ऐसे भी लोग हैं जो बाहर से सुंदर नहीं होते मगर उनके भीतर भावों की पवित्रता इतनी ज्यादा होती है कि उनका व्यक्तित्व चुंबकीय बन जाता है। सुंदर होने और दिखने में बहुत बड़ा अंतर है।
*शिक्षा:-*
आपका चरित्र ही आपका सबसे बड़ा गुण है..!!