दुनिया को शैतानों से बचाने का अब एक ही उपाय था और…
सोमवार को वे मिले, मंगलवार को नैन, बुध को उनकी नींद गई,…
सुष्मिता ने अपनी जवानी में जो खोया था उसका जब उसे एहसास…
वह प्यार की प्यास थी या जिस्म की भूख, हवस का तूफान…
सुंदर अप्सरा सा बेदाग चेहरा, चमकदार ललाट, कश्मीरी सेब जैसे सुरमई गाल,…
प्रेम में डूबे राहुल ने सीमा की आंखों में आंखें डालकर उसे…
सोमवार को वे मिले, मंगलवार को नैन, बुध को उनकी नींद गई, जुम्मेरात को चैन, शुक्र, शनि उनके कटे मुश्किल…
Read More »অজয় ছিল এক সাধারণ মানুষ, কিন্তু তার স্বপ্ন ছিল বিশাল। সে প্রচণ্ড ধনী হতে চেয়েছিল—এতটাই ধনী যে পুরো শহর তার…
Read More »कहते हैं कि पैसा सब कुछ नहीं होता। लेकिन यह बात भी अपनी जगह चट्टान की तरह अडिग है कि पैसे…
Read More »वेलकम मौत कोई नहीं कहता! मौत का स्वागत कोई नहीं करता! लेकिन जिंदगी में एडवेंचर की खोज में निकले कुछ खतरों के खिलाड़ियों ने सरासर यह दु:साहस किया, उन्होंने मौत की आंखों में आंखें डालकर खुद ही कहा ‘वेलकम मौत’…. फिर क्या हुआ? जानने के लिए पढ़िए खौफ और मौत की सरसराहट से भरी यह कहानी.. वेलकम मौत ! भाग…
Read More »तंत्र और षड्यंत्र देश के एक प्रतिष्ठित और बिजनेसमैन परिवार को खत्म करने के लिए एक तरफ तंत्र था और एक तरफ षड्यंत्र,बीच में थी अपने परिवार की शाख बचाने में लगी चंडिका!..फिर छिड़ गई एक बड़ी जंग!.. कौन जीता? तंत्र….षड्यंत्र या चंडिका! जानने के लिए पढ़िए बुलेट ट्रेन की रफ्तार से भी तेज यह कहानी तंत्र और षड्यंत्र पहला…
Read More »रात के अंधेरे में, जब पूरा शहर सो रहा था, अर्जुन अकेले सड़क पर चला जा रहा था। उसकी आँखों में गुस्सा था, हाथ में एक शराब की बोतल और दिमाग में सिर्फ एक ही ख्याल—बदला। उसका सबसे अच्छा दोस्त रवि उसे धोखा देकर उसकी ज़िंदगी बर्बाद कर चुका था। बिज़नेस छीन लिया, प्यार छीन लिया, और अब अर्जुन के…
Read More »रात के अंधेरे में, वीरान सड़क पर एक आदमी लड़खड़ाते हुए चल रहा था। उसके कपड़े खून से सने हुए थे, लेकिन उसके चेहरे पर अजीब-सी तृप्ति थी। उसके होंठों पर हल्की मुस्कान थी, मानो उसने कोई खतरनाक खेल खेला हो… और जीत गया हो। उसका नाम था रघु। रघु बचपन से ही खून देखकर अजीब-सा रोमांच महसूस करता था।…
Read More »रात के सन्नाटे में, रोहन का पेट जोर-जोर से चिल्ला रहा था। वह पिछले दो दिनों से भूखा था। जेब में एक भी पैसा नहीं, घर में खाने का एक दाना भी नहीं। मजबूरी में, वह शहर के पुराने बाज़ार की तरफ निकल पड़ा, जहाँ रात को भी कुछ ढाबे खुले रहते थे। चलते-चलते उसकी नज़र एक अजीब-सा ठेला पर…
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