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खून का नशा

रात के अंधेरे में, वीरान सड़क पर एक आदमी लड़खड़ाते हुए चल रहा था। उसके कपड़े खून से सने हुए थे, लेकिन उसके चेहरे पर अजीब-सी तृप्ति थी। उसके होंठों पर हल्की मुस्कान थी, मानो उसने कोई खतरनाक खेल खेला हो… और जीत गया हो।

उसका नाम था रघु

रघु बचपन से ही खून देखकर अजीब-सा रोमांच महसूस करता था। पहले छोटी-छोटी चोटें देखकर उसे आनंद आता था, फिर धीरे-धीरे यह नशा बढ़ता गया। वह जानवरों को चोट पहुँचाने लगा, फिर बड़े अपराधों की दुनिया में कदम रख दिया।

एक दिन उसे एक रहस्यमयी आदमी मिला। वह लंबा, काले कपड़ों में लिपटा हुआ था, उसकी आँखें ठंडी और गहरी थीं।

“खून पसंद है?” उस आदमी ने धीमे स्वर में पूछा।

रघु हँस पड़ा। “मुझे खून से प्यार है।”

आदमी ने उसकी तरफ एक छोटा शीशे की बोतल बढ़ाई। “इसे पी लो, और तुम्हें असली नशा महसूस होगा।”

रघु ने बिना सोचे-समझे बोतल को उठा लिया और एक ही घूंट में पूरा पी गया।

और तभी, उसकी आँखें चौड़ी हो गईं।

उसके शरीर में आग की लहर दौड़ गई। उसकी नसें जैसे जलने लगीं, पर दर्द नहीं था—बल्कि एक अजीब-सा आनंद था। वह महसूस कर सकता था… हर धड़कता हुआ दिल, हर नसों में बहता हुआ गर्म खून। उसकी भूख बढ़ गई थी। अब उसे खून देखने से नहीं, खून पीने से नशा मिलता था।

अब, हर रात वह शिकार पर निकलता। एक नए शिकार की तलाश में… एक और गिलास खून के नशे का स्वाद लेने के लिए।

और धीरे-धीरे, शहर में खौफ फैलने लगा।

कोई नहीं जानता था कि हत्यारा कौन है, लेकिन एक चीज़ तय थी—जो भी एक बार उसके जाल में फँसता, वह कभी वापस नहीं आता।

क्योंकि रघु को खून का नशा हो चुका था।

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