भयहिन्दी

Welcome Maut

वेलकम मौत कोई नहीं कहता! मौत का स्वागत कोई नहीं करता! लेकिन जिंदगी में एडवेंचर की खोज में निकले कुछ खतरों के खिलाड़ियों ने सरासर  यह दु:साहस किया, उन्होंने मौत की आंखों में आंखें डालकर खुद ही कहा ‘वेलकम मौत’…. फिर क्या हुआ? जानने के लिए पढ़िए  खौफ और मौत की  सरसराहट से भरी यह कहानी.. वेलकम मौत !

भाग 1

“मैं मैं कहाँ हूँ? मैं कहाँ हूँ?” एक दर्द भरी आवाज उस पूरे वार्ड में गूँज उठी।

आई.सी.यू. में लेटे हुए उस पेशेंट के मुँह पर ऑक्सीजन मास्क लगा हुआ था। उसकी आँखें धीरे धीरे खुल रही थी। उसने अपने आसपास सिर घूमाकर देखा। उसकी आँखों में बेचैनी सी दिखाई दे रही थी। उसने अपने हाथ पैर हिलाने की कोशिश की लेकिन ऐसा लगा जैसे सब कुछ सुन्न पड़ गया हो।

जैसे ही उसे पूरी तरह से होश आया और कोई बात उसके जेहन में कौंधी तो एक भयानक डकार के साथ वह चीख पड़ा- “नहींऽऽ! ऐसा नहीं हो सकता! ऐसा कभी नहीं हो सकता!”

और वह तेज तेज आवाज में चिल्लाने लगा। उसकी दर्दनाक और तेज आवाज पूरे वार्ड रूम को मानो हिलाते जा रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे कमरे की दीवारें भरभराकर नीचे जा गिरेगी।

कुछ ही दूरी पर बैठी हुई नर्स, जो कि नींद की वजह से हल्की सी झपकी ले रही थी। उस तेज चीख को सुनकर अचानक ही हड़बड़ा कर स्टूल से नीचे जा गिरी। इतनी तेज आवाज से कोई भी सहम सकता था। वह किसी तरह गिरती पड़ती वार्ड रूम के बाहर की तरफ भागी। बाहर निकलने के बाद उसने पीछे घूमकर भी नहीं देखा और सीधा भागती हुई डॉक्टर की केबिन में जा पहुँची।

हर बार की तरह उसने केबिन के अंदर आने की परमिशन भी नहीं ली और हाँफती हुई डॉक्टर की टेबल के पास आकर रुकी।

“सर… सर.. उसे होश आ गया। होश आ गया उसे। वह बहुत बुरी तरह से चीख रहा है।” नर्स ने हकलाते हुए कहा।

उसके चेहरे से पसीना बह रहा था। उसकी यह हालत देखकर डॉक्टर तुरंत अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए। पेशेंट के चीखने की आवाज तो उन तक भी आ चुकी थी। कुछ ही देर बाद डॉक्टर के साथ साथ नर्स और इंस्पेक्टर गौतम भी उसी वार्ड रूम में मौजूद थे। जिसमें वह पेशेंट पड़ा हुआ था।

वार्ड में आकर उन्हें बहुत दर्दनाक सीन दिखाई दिया। गला फाड़कर चिल्लाने के बाद जब वह पेशेंट थक गया तो खुद ही चुप हो गया। अब उसकी आँखों से भयानक तरीके से आंसू बह रहे थे। उसका यह हाल देखकर नर्स ही नहीं डॉक्टर और इंस्पेक्टर गौतम के दिल भी पसीज गए।

सभी ने एक दूसरे की तरफ देखा। कुछ पल तक तो कोई कुछ भी नहीं बोल सका। उनके ठीक सामने वेंटिलेटर पर जो पेशेंट पड़ा हुआ था। ना तो उसके हाथ मौजूद थे और ना ही पैर। उसके शरीर में अगर कुछ मौजूद था, तो वह था सिर और उसका धड़।

“भगवान का बहुत बहुत शुक्र है जो तुम्हें होश आ गया। तुम ही एकमात्र ऐसे शख्स हो जो उस मौत के जंगल से बचकर आ सके जहाँ से आज तक कोई जिंदा नहीं लौटा है।” सामने खड़े इंस्पेक्टर गौतम ने कहा।

उनकी आँखों में उस पेशेंट के लिए सहानुभूति थी लेकिन उससे भी कहीं ज्यादा वह अपनी ड्यूटी के प्रति सतर्क दिखाई दे रहा था। आंसुओं से भरी आँखों से पेशेंट ने इंस्पेक्टर की तरफ देखा। उसके चेहरे से लग रहा था जैसे वह कह रहा हो कि अब जिंदा होकर भी क्या फायदा! ऐसी जिंदगी से तो मर जाना ही अच्छा है! मगर उसके मुँह से बोल नहीं फूट रहे थे।

“आज तक जो भी उस शापित जंगल में गया वो जिंदा लौटकर नहीं आया। यहाँ तक कि हमारे अत्याधुनिक उपकरण तक उस जंगल में काम नहीं करते। उनका सिस्टम न जाने कैसे अपने आप फेल हो जाता है। हम जानना चाहते हैं कि उस जंगल में ऐसा क्या है और तुम्हारे साथ वहाँ क्या क्या हुआ?” पुलिस इंस्पेक्टर ने कहा जबकि डॉक्टर और नर्स चुपचाप खड़े बस जैसे पेशेंट के बोलने का इंतजार कर रहे थे। जबकि पेशेंट पुलिस इंस्पेक्टर को देख रहा था।

“मुझे पता है रघुवीर कि तुम इस समय जिस दर्द से गुजर रहे हो उस दर्द को सह पाना आम आदमी के बस की बात नहीं है। लेकिन अगर तुम वहाँ के बारे में हमें बता दोगे तो हो सकता है कि जो दर्द तुम्हें मिला है वह किसी और को ना मिले। हम उस शापित जंगल की गुत्थी को सुलझाने की पूरी कोशिश करेंगे ताकि आगे चलकर कोई और उसका शिकार ना बने।” पुलिस इंस्पेक्टर ने एक बार फिर धारा प्रवाह कहा।

सामने वेंटिलेटर पर पड़े पेशेंट रघुवीर ने एक क्षण के लिए पुलिस इंस्पेक्टर को देखा और फिर तेज आवाज में वह चीख उठा, “कोई भी नहीं सुलझा सकता वहाँ की गुत्थी, कोई भी नहीं! जो भी उस श्रापित जंगल में जाएगा, वह बहुत बुरी मौत मारा जाएगा।”

उसकी आँखों में भयानक डर की लहरें हिलोरे मार रही थी। भयानक मानसिक और शारीरिक आघात से जूझ रहे उस पेशेंट ने पहले नर्स, डॉक्टर और इंस्पेक्टर को घूर कर देखा और फिर बताना शुरू किया-

“मैं रघुवीर सहाय! इंडियन आर्मी में एक बड़ी पोस्ट पर था। वैसे तो अभी भी हूँ लेकिन अब जॉइनिंग पॉसिबल नहीं है। उस दिन जब मैं अपनी ड्यूटी करके वापस अपने घर पहुँचा तो मेरी पत्नी नीता सहाय बहुत खुश थी।”

और इसी के साथ वह पेशेंट अपने अतीत में खोता चला गया।

क्रमशः –

भाग 2

फ़्लैशबैक-

“आप आ गए! मैं कब से आपका ही इंतजार कर रही थी।” नीता सहाय दरवाजे पर ही खड़ी मिली। वह बहुत खुश दिखाई दे रही थी। उसने मुस्कुराते हुए रघुवीर का स्वागत किया।

“आज कुछ खास है क्या? तुम बहुत खुश दिखाई दे रही हो!” रघुवीर सहाय ने भी मुस्कुराते हुए पूछा।

“क्या आपको कुछ याद नहीं है?” नीता सहाय के चेहरे की खुशी धीरे धीरे गायब होने लगी।

“आज क्या खास है?  चलो तुम ही बता दो। अभी तो मुझे याद नहीं आ रहा। सच में नहीं आ रहा।” रघुवीर सहाय ने अंदर आते हुए अपने दिमाग पर जोर डालकर कहा।

उसकी बात सुनकर नीता के चेहरे के रंग बहुत तेजी से बदलने लगे। अभी कुछ देर पहले वह जितनी ज्यादा खुश दिखाई दे रही थी। अब उतनी ही ज्यादा नाराज नजर आ रही थी।

“कुछ नहीं है! मैं तो बस ऐसे ही कह रही थी।” नीता ने नाराजगी से कहा और किचन की तरफ जाने लगी कि तभी रघुवीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“अरे! इसमें इतना नाराज होने वाली कौन सी बात है! अभी अभी मैं ड्यूटी से आया हूँ तो शायद इसलिए दिमाग काम नहीं कर रहा है। हो सकता है कुछ देर में याद आ जाए। अच्छा! रुको!” कहते हुए रघुवीर ने अपना फोन निकाला और कैलेंडर चेक करने लगा। तभी उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई।

“अच्छा, तो यह बात है! हाँ, मुझे याद था लेकिन अचानक से ड्यूटी से आते ही तुमने पूछ लिया इसलिए तुरंत दिमाग में नहीं आया। सॉरी! सॉरी! बताओ क्या प्लान है? किस तरह सेलिब्रेट करना चाहती हो तुम अपना बर्थडे? हम उसे उसी तरह से सेलिब्रेट करेंगे।” रघुवीर ने नीता को मनाते हुए कहा।

नीता के चेहरे पर अभी भी हल्की सी नाराजगी दिखाई दे रही थी। रघुवीर ने उसे खींचकर अपनी बाहों में ले लिया।

“अब माफ भी कर दो। देखो, मैं अभी ड्यूटी से आया हूँ। वहाँ की टेंशन अलग रहती है इसलिए गलती हो गई।” रघुवीर ने दोबारा कहा।

“हम्म!” नीता ने बस इतना कहा और फिर से उठकर जाने लगी। लेकिन रघुवीर ने दोबारा हाथ पकड़ लिया।

 “मैंने तुमसे कुछ पूछा है। पहले उसका जवाब दो।” नीता धीरे धीरे नॉर्मल हो रही थी।

“मैं सोच रही हूँ कि इस बार कुछ तूफानी हो, कुछ डेरिंग, कुछ एडवेंचर टाइप।” नीता ने अपने मन में दबायी बात को आखिर रघुवीर के सामने खोल ही दिया।

“बेहतरीन आइडिया है। हर बार हम तुम्हारा बर्थ-डे घर में ही सेलिब्रेट करते हैं जो कि अब बोरिंग हो चला है। अब जब तुमने इतना सोचा ही है तो यह भी बता दो कि जो तुम सोच रही हो उसकी कोई प्लानिंग भी की है या नहीं?” रघुवीर ने मुस्कुराते हुए पूछा।

“हाँ, मैंने पहले से ही सोच रखा है बस आपको भी पसंद आना चाहिए।” नीता ने मुस्कुराते हुए कहा।

“अरे! जो तुम्हें पसंद है वह मुझे क्यों नहीं आएगा? अब बताओ भी क्यों गोल गोल घूमा रही हो?” रघुवीर ने जिज्ञासा से पूछा।

 “मैं सोच रही हूँ कि इस बार धीरपुर के जंगलों की सैर की जाए।” नीता ने कहा तो एक पल के लिए रघुवीर के चेहरे के भाव तेजी से बदले।

“धीरपुर के जंगलों की? तुम्हें पता भी है वहाँ के बारे में लोग क्या क्या कहते हैं?” रघुवीर की आवाज में उत्तेजना थी।

 “हाँ, मुझे पता है लोग क्या क्या कहते हैं और बस वही वजह है मेरे वहाँ जाने की। इससे अच्छा एडवेंचर और क्या हो सकता है हमारे लिए?” नीता के चेहरे पर मुस्कुराहट बरकरार थी।

“अरे! उसे शापित जंगल के नाम से जाना जाता है। लोग कहते हैं कि वहाँ जाने वाले वापस जिंदा लौटकर नहीं आते। इतना कुछ जानने के बाद भी तुम वहाँ जाना चाहती हो। क्या तुम्हें डर नहीं लगता?” रघुवीर ने पूछा। उसके चेहरे पर गंभीरता थी।

“जिसका पति आर्मी में जाँबाज ऑफिसर हो। उसे भला किस बात का डर और वैसे भी मुझे ऐसी अफवाहों पर भरोसा नहीं है? दुनिया कितनी आगे निकल गई है और इस वैज्ञानिक युग में भी लोग भूत प्रेत आदि की अफवाहें उड़ाते रहते हैं। मुझे तो लगता है कि वहाँ पर कुछ ऐसा है जिसे वहाँ के लोग पब्लिक नहीं होने देना चाहते हैं और बस इसी वजह से इस तरह की अफवाहें फैला देते हैं।” नीता ने अपनी बात रखी।

“बात तो तुम्हारी सही है। मैं भी जानना चाहता हूँ कि वहाँ आखिर ऐसा है क्या? जिसकी वजह से यह अफवाह उड़ाई जा रही है। चलो अच्छा है तुम्हारे बर्थडे के बहाने एक सीक्रेट का पता लग जाएगा और हमारे लिए एक मिशन टाइप भी हो जाएगा।” रघुवीर ने मुस्कुराते हुए कहा तो नीता भी मुस्कुरा उठी।

******

उस सुनसान पहाड़ी इलाके से घिरी हुई सड़क पर एक ओपन रूफ आर्मी वाली जीप बड़े आराम से आगे बढ़ती चली जा रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे अंदर बैठे लोगों और ड्राइवर को कोई जल्दी नहीं थी। वे राइडिंग का मजा ले रहे थे। साथ ही साथ आसपास के माहौल का भी आनंद उठा रहे थे।

उस जीप में आठ लोग मौजूद थे। ड्राइविंग सीट पर खुद रघुवीर सहाय स्टेरिंग संभाले हुए था। उसके बगल में एक औसतन दुबला पतला लड़का अपने गले में कैमरा लटकाए हुए बैठा था। जिसकी आँखों पर मोटी फ्रेम का चश्मा चढ़ा हुआ था। जीप के पिछले हिस्से में दो महिलाएं और दो आदमी बैठे हुए थे। जिनमें से एक नीता सहाय थी और दूसरी उसकी दोस्त सरिता। दोनों के सामने की सीट पर जो आदमी बैठे हुए थे। उनमें से एक चुस्त शरीर वाला आर्मी ऑफिसर लग रहा था। उसके हाथ में गन मौजूद थी। जबकि उसके ठीक बगल में एक और आदमी बैठा हुआ था। जो अपनी आँखों पर नजर का चश्मा चढ़ाए हुए था। वह ना तो ज्यादा दुबला था और ना ही ज्यादा मोटा।

इन लोगों के साथ उस कार में दो लड़के और बैठे थे, जिनकी उम्र 20- 22 साल से ज्यादा नहीं लग रही थी। वे दोनों बहुत ही ज्यादा एक्साइटेड नजर आ रहे थे। उनमें से एक का नाम अजय था तो दूसरे का विजय।

ठीक उसी समय रघुवीर सहाय के बगल में बैठे दुबले पतले लड़के ने एक्साइटेड आवाज में कहा, “मैं तो जाने कब से इस जंगल की सैर करना चाहता था लेकिन कभी मौका ही नहीं मिला। और सबसे बड़ी बात तो यह थी कि मेरे साथ कोई आने के लिए भी तैयार नहीं था।”

उसकी बात सुनकर रघुवीर मुस्कुरा उठा।

“इस जंगल के बारे में इतनी भयानक भयानक अफवाहें फैली हुई है तो कौन आता तुम्हारे साथ इस श्रापित जंगल में। आखिर सभी को अपनी जान प्यारी है।” पीछे बैठे चश्मे वाले आदमी ने कहा।

“अरे! कुछ नहीं है इस जंगल में। मुझे तो लगता है कि माफिया लोगों ने यहाँ पर अपना डेरा जमा लिया है और वही लोग यह अफवाहें फैला रहे हैं ताकि आम जनता यहाँ से दूर रहे और उनका धंधा चलता रहे। लेकिन हमने बड़े बड़े गैंग का सफाया किया है। अगर ऐसा कुछ यहाँ हुआ तो उनकी भी खैर नहीं।” पीछे बैठे आर्मी ऑफिसर ने कहा।

इस समय तक चारों तरफ शाम का धुंधलका फैलना शुरू हो चुका था। वीरान सी सड़कें और भी ज्यादा वीरान और मनहूस दिखाई देने लगी थी। यह धीरपुर जंगल की सीमा रेखा थी और सीमा पर ही ऐसे मनहूसियत फैली हुई दिखाई दे रही थी कि कोई नॉर्मल इंसान होता तो यहीं से भाग खड़ा होता।

“शाम भी हो चुकी है और अब हम जंगल में एंट्री ले चुके हैं। मुझे लगता है कि कोई अच्छी सी जगह देखकर टेंट लगा लिया जाए। रात में जंगल में घूमने में कोई मजा नहीं आने वाला उल्टा जंगली जानवर डिस्टर्ब होंगे।” रघुवीर ने कहा

 “हाँ, तुम सही कह रहे हो। ऐसा ही करना चाहिए। कोई अच्छी सी जगह देखकर… अरे! यह क्या कर रहे हो? मैंने तुम्हें जीप को रोकने के लिए नहीं कहा।” पीछे बैठे आर्मी ऑफिसर ने बताते बताते अचानक तेज आवाज में कहा क्योंकि अचानक से ही जीप को एक तेज झटका लगा था और जीप चलते चलते अचानक ही रुक गई थी।

झटका इतना तेज था कि जीप में सवार सभी लोग एक दूसरे के ऊपर गिरने पड़ने लगे। सभी ने हैरानी भरी नजरों से रघुवीर सहाय की तरफ देखा जबकि रघुवीर सहाय की आँखों में भी हैरानी साफ दिखाई दे रही थी।

क्रमशः-

भाग 3

“क्या हो गया? आपने अचानक से जीप क्यों रोक दी?” नीता ने अपने पति रघुवीर सहाय की ओर देखते हुए पूछा।

सभी हैरान थे क्योंकि अभी ऐसा कोई डेस्टिनेशन नहीं आया था। और ना ही जीप के आगे कोई ऐसी चीज आई थी। जिसे देखकर जीप रोक दी जाए।

“अरे! मैंने कुछ नहीं किया! पता नहीं कैसे यह अपने आप ही झटका खाकर रुक गई! रुको देखता हूँ!” रघुवीर सहाय ने कहा और जीप से उतर गया।

उसने जीप का अच्छे से मुआयना किया। लेकिन कोई भी खराबी नजर नहीं आई।

“पता नहीं, अचानक से क्या हो गया! कोई खराबी तो इसमें दिख नहीं रही है, फिर यह रुक कैसे गई?” रघुवीर सहाय बड़बड़ाया।

“शायद कोई माइनर खराबी आ गई होगी। जो तुम्हारी नजर में नहीं आ रही है। यह मैकेनिक ही बता सकता है लेकिन जीप का इस तरह से अचानक झटका खाकर रुकना हैरानी की बात है।” कैमरामैन अरविंद ने कहा।

 “हाँ अरविंद, शायद ऐसी ही कोई खराबी निकल आई होगी लेकिन घर से निकलने के पहले मैंने जीप का अच्छी तरह चेकअप करवाया था ताकि ऐसी सिचुएशन ना आने पाए। तब तो इसमें कोई खराबी नहीं दिखी थी।” रघुवीर सहाय ने कहा।

“वैसे अब इस पर डिस्कस करके टाइम खराब करने से कोई फायदा नहीं होने वाला। और वैसे भी हम अपने डेस्टिनेशन पर पहुँच ही चुके हैं। अंधेरा भी घिरने वाला है। अच्छा होगा हम कोई अच्छी सी जगह देखकर अपना टेंट जमा ले। बाद में अपने साथियों को कॉल करके हेल्प ले ही सकते हैं, यह हमारे लिए कोई बड़ी बात नहीं है।” पीछे बैठे विक्रम नाम के आर्मी ऑफिसर ने कहा।

वह भी जीप से उतर चुका था। बाकी लोग भी उसकी बातों से एग्री थे। सभी जीप से उतर गए। सामान का बैग सभी अपने अपने पीठ पर लादकर टेंट डालने के लिए अच्छी सी जगह की खोज में आगे बढ़ने लगे। वहीं अजय और विजय भी एक्साइटेड होकर जंगल के चारों तरफ नजरें दौड़ाने लगे लेकिन चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था।

“यह जंगल तो वाकई बड़ा भयानक लग रहा है। यहाँ की मनहूसियत देखकर ऐसा लगता है जैसे जो अफवाहें फैली हुई है वह वाकई में सही है।” अजय ने आसपास नजरें घुमाते हुए कहा।

वे लोग जंगल में प्रविष्ट हो चुके थे। चारों तरफ भयानक सन्नाटा फैला हुआ था। रह रहकर साँय साँय की आवाज आ रही थी। कहीं भी एक चिड़िया तक नजर नहीं आ रही थी।

“यार, यहाँ पर तो एक चिड़िया तक दिखाई नहीं दे रही है। कुछ तो गड़बड़ है।” नीता की दोस्त सरिता ने कहा।

 “जब भी कोई अजनबी जंगल में कदम रखता है तो जंगल के जीव जंतु सतर्क हो जाते हैं। ठीक वैसे ही जैसे किसी मोहल्ले में नए आदमी के आने पर मोहल्ला पूरी शांति के साथ का निरीक्षण करने लगता है। ठीक उसी तरह से जंगल के जीव जंतु भी छुपकर इस समय हमारा निरीक्षण कर रहे हैं। देखना कुछ ही देर में पूरा जंगल आबाद हो जाएगा।” विक्रम ने मुस्कुराते हुए कहा तो सभी मुस्कुराने लगे।

 “बहुत एक्सपीरियंस है आपको इन चीजों का!” नीता ने मुस्कुराते हुए कहा।

“हाँ बिल्कुल है! क्यों नहीं होगा! आखिर आर्मी मैन जो हूँ। हमेशा मिशन पर जाता रहता हूँ तो इस तरह के एक्सपीरियंस तो होने ही है।” विक्रम की बात सुनकर सभी हँस पड़े।

कुछ देर तक सन्नाटा छाया रहा। वे लोग जंगल में धीरे धीरे आगे बढ़ रहे थे। लेकिन अभी भी उन्हें कोई ऐसी जगह नजर नहीं आई जहाँ वे टेंट लगा सके।

 “यार हम जैसे जैसे अंदर की तरफ बढ़ रहे हैं, जंगल और भी घना होता जा रहा है। लगता है, टेंट लगाने की जगह नहीं मिलने वाली।” विनय नाम के आदमी ने आसपास नजरें दौड़ाते हुए कहा।

इससे पहले कि कोई उसकी बात का जवाब दे पाता। अचानक सभी के कानों में एक भयानक फुँफकार की आवाज आई। आवाज इतनी कर्कश और भयानक थी कि सभी एक पल के लिए काँप गए। विक्रम की बंदूक आवाज की दिशा में घूम गई।

“गोली मत चलाना विक्रम! हम इन जीवों के संरक्षण के लिए हैं। उनकी हत्या के लिए नहीं।” रघुवीर ने विक्रम को टोकते हुए कहा।

“आत्मरक्षा पहले नंबर पर आती है रघुवीर! अगर हम ही जिंदा नहीं रहेंगे तो किसका संरक्षण कर सकेंगे।” विक्रम ने अपनी बंदूक पूरी सावधानी से संभालते हुए आसपास नजर दौड़ाई।

 “बात तो सही है तुम्हारी और ऐसा होना भी चाहिए। अगर हमारी ही जान चली जाए तो कैसा संरक्षण!” अनुज ने कहा। सभी सतर्क हो चुके थे यहां तक की नीता और सरिता ने भी अपनी पिस्तौल निकाल ली थी।

रघुवीर हैरानी से उन सभी की हरकत देख रहा था। वे सभी कुछ ज्यादा ही सतर्क दिखाई दे रहे थे। इसका साफ मतलब था कि वे पूरी तैयारी के साथ आए थे।

“हा हा‌ हा हा! तुम क्या संरक्षण करोगे हमारा! हम तुम्हारा भक्षण करेंगे। बहुत दिनों बाद इंसानी माँस की गंध आई है।”  एक बहुत ही भयानक आवाज उन सभी के कानों में पड़ी। आवाज कर्कश होने के साथ ही उसमें अजीब सा खुरदुरापन और कठोरता सुनाई पड़ रही थी। उस भयानक आवाज को सुनकर उन सभी के होश उड़ गए। उन्होंने आसपास घूम कर देखा लेकिन कहीं कुछ भी नहीं था।

“लगता है, कोई हमारा मजाक उड़ा रहा है।”  विक्रम ने चारों तरफ अपनी पैनी नजरों से देखते हुए कहा।

“तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि कोई हमारा मजाक उड़ा रहा है?” अरविंद ने तुरंत पूछा। वह भी पूरी तरह से सतर्क था।

“सिंपल सी बात है। जैसा कि हमने अभी कुछ देर पहले ही डिस्कस किया था। यहाँ पर ऐसा कुछ है जो कुछ लोग पब्लिक नहीं होने देना चाहते हैं। उसके लिए कुछ भी कर सकते हैं। मैंने तो यहाँ तक देखा है कि ऐसे जंगलों में अपराधी किस्म के लोग जगह जगह टेप रिकॉर्डर फिट कर देते हैं। हो सकता है जो कुछ हम सुन रहे  हैं, वह टेप रिकॉर्डर की आवाज हो।” अभी विक्रम अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि तभी पास की झाड़ियों में एक तेज सरसराहट की आवाज हुई और जैसे ही यह आवाज आई सभी उस आवाज की दिशा में एक झटके में घूम गए। लेकिन जिस तरफ से आवाज आई थी। वहाँ कुछ भी दिखाई नहीं दिया।

“देखा! मैंने कहा था ना यह टेप रिकॉर्डर का ही कमाल है। अगर यहाँ कुछ होता तो हमें साफ साफ दिखाई देता लेकिन देखो वहाँ कुछ है ही नहीं।” विक्रम की बात पूरी नहीं होने से पहले ही अचानक सरिता की हलक से चीख निकल गई।

“वह.. वहाँ..वहाँ देखो! वहाँ पर देखो!” सरिता की काँपती हुई आवाज में डर एकदम साफ साफ नजर आ रहा था। एक पल के लिए सभी की आँखें सरिता की तरफ घूम गई और फिर दूसरे ही पल उस तरफ घूम गई। जिस तरफ उसकी उंगलियाँ उठी थी।

क्रमशः

भाग 4

‘फुफssss! फूऊऊ!’

जोरदार फुँफकार से सभी हड़बड़ा गए। सामने का नजारा ऐसा था की सभी लोगों की रीढ़ की हड्डियों में जैसे चीटियां रेंगने लगी।

सरिता घबराई हुई आवाज में बोल पड़ी-  “बाप रे बाप! इतने सारे साँप! जल्दी से यहाँ से भागो वरना… वरना हम सभी मारे जाएंगे!”

अरविंद भी चीखा – “देखो तो सही! ये कितनी तेजी से हमारी ही तरफ बढ़ते आ रहे हैं। भागो भागो!”

तभी एक अनुज ने जमीन से पत्थर उठा कर साँपों की तरफ फैंक मारा, लेकिन ऐसा लगा जैसे पत्थर लगते ही उन साँपों की स्पीड दुगनी हो गई हो। वे तेजी से इन सभी की तरफ़ लपकते चले आ रहे थे। विक्रम के हाथ मे बंदूक तो थी पर उसे फायर करने का मौका नहीं मिला, आखिर किस किस पर फायर करता, साँपों के पूरे झुंड थे वहाँ।

वे सभी लोग वहाँ से तेजी से दूसरी दिशा में भागे लेकिन विनय पीछे ही रह गया। उसने पूरी ताकत लगा कर वहाँ से भागने की कोशिश की, साँप उससे कुछ ही कदम पीछे थे, हड़बड़ाहट में  सामने पड़े पत्थर से उसका पैर जा टकराया और वह धड़ाम से मुँह के बल जमीन पर जा गिरा।

“आहsss!” उसके मुँह से भयानक चीख निकली।

आगे आगे भाग रहे सभी लोगों ने पीछे घूम कर देखा तो सैकड़ो साँप उसके जिस्म से बुरी तरह लिपटने को भागे आ रहे थे। अगले ही पल दो दो साँप उसके शरीर से बुरी तरह लिपट गए थे।

“नहींऽऽ! बचाओ! बचाओ!” विनय बुरी तरह चीख पड़ा लेकिन उसे बचाना किसी के भी बस की बात नहीं थी।

अगले ही पल साँपो का कद बढ़ता चला गया। वे साँप अब भयानक अजगर का रूप ले चुके थे। सभी लोग हैरानी भरी नजरों से यह नजारा देखते ही रह गए। यह सब देख उन सभी के तोते उड़ चुके थे।

भयानक तरीके से फुँफकारते हुए अजगर ने अपना मुँह फाड़ा और अगले ही पल विनय को जिंदा ही निगल गया।

“नहीं ऽऽ” विक्रम तेज आवाज में चीख पड़ा।

“चपड़ चपड़” मांस चबाने की आवाज़ से जंगल गूंज उठा।

यह नजारा देख बाकी लोगों का कलेजा काँप गया। वे दुगनी तेजी से सामने की तरफ भागे।

 “हमें वापस जीप की तरफ चलना चाहिए, जीप में हम सुरक्षित रह सकते हैं लेकिन अगर हम ऐसे ही भागते रहे तो जंगल में कहीं भी भटक सकते हैं।” अनुज ने कहा।

“लेकिन हम जीप तक पहुंचेंगे कैसे? जीप वाले रास्ते से तो यह खतरनाक साँप हमारी तरफ बढ़ रहे हैं। हम दाएं बाएं भी नहीं भाग सकते।” अरविंद डरी हुई आवाज में बोला, अपने एक साथी के हश्र को देख सभी के होश उड़ चुके थे।

तभी उन्हें सामने एक तालाब दिखाई दिया तो विक्रम तेज आवाज में बोल उठा – “मुझे लगता है कि यह साँप पानी में नहीं घुस सकते क्योंकि पानी में तैरने वाले साँप अलग ही होते हैं। अगर हम तालाब के अंदर चले जाएंगे तो हम इनसे बच सकते हैं।”

कहने के साथ बिना किसी की बात का इंतजार किये वह तालाब में कूदने के लिए आगे बढ़ा लेकिन रघुवीर ने तुरंत उसका हाथ थाम लिया।

“नहीं, तालाब में ऐसे ही नहीं कूदना है, यहाँ कुछ अजीब है और शायद हमें डराने वाला भी यही चाहता है कि हम तालाब में कूद जाएं। वह देखो उधर।” रघुवीर ने कहा तो सभी उधर देखने लगे।

तालाब के किनारे ही एक नर कंकाल मौजूद था। रघुवीर ने पास से एक टहनी उठाई और तालाब में डाल दी, ऐसा करते ही सभी के होश उड़ गए।

तालाब के अंदर मौजूद खूनी मछलियों ने टहनी को अपने जबड़ों में दबोच लिया था और अब वह टहनी को ही चबा चबाकर खाती जा रही थी। वह मछलियाँ एक दो नहीं बल्कि सैकड़ो की तादाद में थीं।

“बाप रे बाप! ये लकड़ी पर ही ऐसे झपट रही हैं तो हमारा क्या हाल करेंगी, ये जंगल वाकई अजीब लग रहा है।” पहली बार नीता की आँखों में डर दिखाई दिया। उन सभी ने पीछे घूम कर देखा तो साँप अभी भी तेजी से बढ़ते चले आ रहे थे।

सरिता तेज आवाज में बोली- “अब क्या होगा? आगे कुंआ है तो पीछे खाई! बताओ अब हमारी जान कैसे बचेगी! क्या हम पेड़ पर चढ़ कर अपनी जान बचा सकते हैं?”

रघुवीर ने परेशानी भरे भाव में कहा – “साँप तो पेड़ पर भी चढ़ जाएंगे और अगर हम पेड़ पर चढ़े तो फिर भागने के रास्ते ही बंद हो जाएंगे।

नीता बोली – “तब हम क्या करें? क्या अब हमें यहीं मरना होगा?”

रघुवीर अपने आसपास नजरे दौड़ा रहा था ताकि कोई रास्ता निकाला जा सके, पीछे से साँप बहुत तेजी से आगे बढ़ते आ रहे थे। सामने तालाब में सैकड़ों मछलियाँ उन्हें देखकर उछल कूद मचा रही थीं।

तभी रघुवीर की नजर एक बड़े बरगद के पेड़ पर पड़ी। जिसकी लंबी लंबी जड़े नीचे लटक रहीं थीं। उसके चेहरे पर चमक आ गयी।

“हम इस बरगद की जड़ पर झूल कर उस पार जा सकते हैं!” रघुवीर ने नीता और बाकी बचे लोगों की तरफ देखते हुए कहा। लोगों ने हैरानी भरी नजरों से बरगद के पेड़ की तरफ देखा।

“यह बात हमारे दिमाग में पहले क्यों नहीं आई!”  विक्रम जैसे खुशी से चिल्लाया।

वे इतना डर गए थे कि उधर देखते ही उन्होंने दौड़ लगा दी। वे जल्द से जल्द इस मुसीबत को पार कर जाना चाहते थे।

रघुवीर तेज आवाज में बोला – “इस तरह की बेवकूफी मत करो! सावधानी से तालाब पार करो!”

इसके बाद विक्रम ने खूब सावधानी से बरगद की जड़ पकड़ी और थोड़ा पीछे होता हुआ तेजी से तालाब की तरफ झूल गया। जैसे ही जड़ तालाब के किनारे के पास तक पहुँची, उसने बरगद की जड़ छोड़ दी। जिससे वह तालाब के दूसरे किनारे पर जा गिरा। इसी के साथ एक एक करके बाकी लोग भी तालाब पार कर गए।

साँप अब बहुत पास आ चुके थे। वह इतनी ज्यादा संख्या में थे कि उनके अलावा जमीन पर कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा था। सरसराहट की आवाज लगातार पास आती जा रही थी।

रघुवीर बोला – “नीता अब तुम जल्दी से इस तालाब को पार करो! यह जहरीले साँप बस हम पर टूटने ही वाले हैं! जल्दी करो!”

नीता बोली – “लेकिन तुम…!”

रघुवीर उसकी बात काटते हुए बोल उठा, “अरे तुम मेरी फिक्र न करो यार, यहाँ टाइम बिल्कुल नहीं है, जल्दी करो।”

नीता तेजी से आगे बढ़ी और बरगद की जड़ पकड़ कर ठीक वैसे ही किया जैसे बाकी लोगों ने किया था। वह झूल गयी। एक मिनट के अंदर ही वह भी तालाब के उस पार हो चुकी थी। अब केवल रघुवीर बचा था।

एक लंबा और मोटा सा साँप बिल्कुल उसके पास आ चुका था। वह उसके पैर पर चढ़ने ही वाला था कि उसने एक किक मारकर उसे दूर उछाल दिया।

एक साँप को उसने उछाला ही था कि तभी तीन चार साँप और उसके ऊपर झपटे, दूसरे किनारे पर खड़ी नीता के मुँह से चीख निकल गई, “रघुवीर बचो!”

रघुवीर की तेज निगाहों ने सामने की तरफ साँपों के बीच एक उभरे हुए पत्थर को देख लिया था। जिस पर कोई साँप मौजूद नहीं था। उसने बरगद की जड़ पकड़े हुए ही एक तेज छलांग लगाई और उस पत्थर पर जा खड़ा हुआ। पत्थर के चारों तरफ सांप खतरनाक तरीके से रेंग रहे थे। इससे पहले की सांप पत्थर के ऊपर चढ़ते, रघुवीर तालाब की तरफ पूरी ताकत से झूल गया। दूसरे ही पल वह भी तालाब के दूसरे किनारे पर खड़ा था।

“उफ्फ! क्या मुसीबत थी यार!” तेज तेज साँस लेता हुआ रघुवीर बोल उठा। नीता भाग कर आई और उसको अपने गले से लगा लिया।

तभी एक अनुज चीख उठा – “अरे बाप रे! यह क्या है? भागो! लेकिन अब हम भाग कर कहाँ जाएंगे।”

अचानक सभी की हैरानी भरी नजरें उस तरफ उठ गईं, सामने का दृश्य देख कर उन लोगों की आँखों में भय की लकीरें उभर आईं।

क्रमशः

भाग 5

“किर्रर्रर.. किर्रर्रर.. गुर्र!” अजीब सी आवाजों से जंगल भर गया।

“ये.. ये क्या है?” अरविंद भय से चीख उठा।

विक्रम बोला – “यह तो कोई बड़ा सा मकड़ा दिखाई दे रहा है। अरे.. अरे वह देखो! उस तरफ! ऐसे ही बहुत सारे मकड़े आगे बढ़ते आ रहे हैं! ओफ्फो अब ये क्या मुसीबत है।”

“क्या होगा अब? इन्हें देख कर तो ऐसा ही लग रहा है जैसे यह हमें नुकसान ही पहुँचाना चाहते हैं।” सरिता डर से बोल उठी।

नीता रघुवीर की तरफ देखती हुई बोली – “रघुवीर! अब क्या होगा? हमने यहाँ आकर बहुत बड़ी गलती की! अगर हम यहाँ न आये होते तो आज हम इन अजीब सी मुसीबतों में नहीं फंसे होते।”

रघुवीर बोला – “ऐसी बात नहीं है नीता! एक्सीडेंटली आदमी के साथ कहीं भी कुछ भी हो सकता है, थोड़ा पेशेंस रखो हम जरूर कोई ना कोई रास्ता निकाल लेंगे।”

अनुज ने जमीन से पत्थर उठाया और सबसे आगे चले आ रहे हैं मकड़े के सिर पर फेंक मारा।

पाँच फीट ऊँचा वह मकड़ा अपनी आठों टाँगों पर तेजी से आगे बढ़ रहा था। सिर पर पत्थर लगते ही कुछ ऐसा हुआ जिससे सभी चौंक उठे।

 “पत्थर लगते ही यह तो ऐसे उछल गया जैसे थर्माकोल का बना हो!” नीता ने कहा।

रघुवीर बोला – “इस बात का फायदा हम उठा सकते हैं!”

अनुज बोला- “अगर सभी लोग मिल कर पत्थरों से इनका मुकाबला करें तो जल्द ही हम इस मुसीबत से बाहर निकल सकते हैं।”

अनुज की बात सुनते ही सभी पत्थर उठा उठाकर मकड़ों को मारने लगे। मकड़े भी उछल उछलकर कुछ कदम पीछे गिरते जा रहे थे और दोबारा उठकर उनकी तरफ लपक रहे थे। काफी देर तक यह खेल चलता रहा, अब सभी बिल्कुल थक चुके थे।

“मुझे लगता है अब हम इनका सामना नहीं कर पाएंगे क्योंकि यह बीतते हुए समय के साथ बढ़ते ही जा रहे हैं। जरा देखो तो सही हमारे चारों तरफ मकड़े ही मकड़े दिखाई दे रहे हैं और इनकी संख्या तो अनगिनत है। अगर जल्दी ही हमने कुछ और नहीं सोचा तो यह हमारा कुछ भी कर सकते हैं।”

सरिता ने कहा तो विक्रम बोल उठा – “अगर पत्थर से यह इतना पीछे उछल रहे हैं तो अगर हम किसी डंडे या टहनी से इनके पैरों या सिर पर पूरी ताकत से वार करें तो हो सकता है यह मर जाएं और इस तरह से हम इनसे बच सकते हैं।”

अरविंद बोला – “बात तो तुम्हारी सही है लेकिन यह इतनी ज्यादा संख्या में है, हम कितनों को मारेंगे और अभी हमें यह भी नहीं पता कि अगर हम इन के चंगुल में फँस गए तो यह हमारा क्या हाल करेंगे?”

विक्रम थोड़ा जोशीला था, उसकी हाइट भी अच्छी थी और उसका बदन भी कसरती और गठीला था। देखते ही लग रहा था कि वह मारपीट का शौकीन था, वह अचानक से बोल उठा – “अरे कुछ नहीं होगा, अभी देखो मैं इन्हें पीट पीटकर कैसे भगाता हूँ।”

कहते हुए उसने पेड़ की एक बड़ी सी टहनी तोड़ ली और दौड़ता हुआ मकड़ों के पास जा पहुँचा।

नीता हड़बड़ा कर बोली – “अरे! यह क्या कर रहा है? इतने सारे मकड़ों के बीच अकेले ही कूद गया।”

रघुवीर बोला – “यह बहुत बड़ी बेवकूफी कर रहा है! इसे इस तरह से उनके बीच नहीं कूदना चाहिए था, ठीक है, बहादुरी अच्छी बात है लेकिन जानबूझकर कुंए में कूदना बहादुरी नहीं होती।”

उधर विक्रम ने टहनी का एक भरपूर वार एक मकड़े पर किया तो वह जमीन से जा चिपका, उसका ऊपरी हिस्सा फट गया और काले रंग का खून निकलने लगा। यह देख विक्रम का जोश और बढ़ गया। वह बड़ी फुर्ती के साथ उन मकड़ों को मारने लगा लेकिन मकड़े बढ़ते ही जा रहे थे। इससे पहले कि वहाँ मौजूद बाकी लोग और रघुवीर भी उसकी सहायता के लिए आगे बढ़ते, कई सारे मकड़े हवा में ऊपर उछले और विक्रम को अपने शिकंजे में दबोचने के लिए झपटे। लेकिन एन मौके पर विक्रम लुढ़ककर उनसे दूर हो गया।

बाकी जो अभी आगे बढ़ने की सोच रहे थे। वे भी काँप उठे। मकड़े बहुत ही वीभत्स तरीके से विक्रम की ओर बढ़ रहे थे और बहुत से मकड़े अब इन लोगों की तरफ भी आगे बढ़ते चले आ रहे थे।

अनुज बोला – “अब मरना तो है ही, यहाँ खड़े खड़े मुँह ताकने से अच्छा हम सभी एक साथ मिल कर इनका सामना करें।”

 इतना कह कर वह आगे बढ़ने ही वाला था कि तभी – “रुको! इस तरह से उनके आगे मत जाओ! हम कोई और तरीका सोच सकते हैं!” रघुवीर ने अनुज को रोक लिया।

“अरे भाड़ में जाए तुम्हारा तरीका! यहाँ कोई तरीका नहीं है जिससे हम इनसे पार पा सके, तरीका यही है कि हम सब एक साथ मिल कर इन पर हमला कर दें।”

रघुवीर बोला – “यह लास्ट ऑप्शन है, बस एक मिनट रुको और सोचो कि हम इसके अलावा और क्या कर सकते हैं।”

अनुज ठिठक गया, जान उसको भी प्यारी थी। वे सभी आस पास देखने लगे कि कोई रास्ता मिल जाए। रघुवीर भी आसपास नजरें दौड़ाने लगा।

वहाँ कुछ दूरी पर घास का एक बड़ा सा ढेर दिखाई दिया। रघुवीर चमकती आँखों से उसे देखता हुआ बोला – “मिल गया! मिल गया! वह तरीका मिल गया जिससे हम इन सभी को खत्म कर सकते हैं। वह भी एक साथ!”

सभी हैरानी से रघुवीर का मुँह ताकने लगे। रघुवीर भागता हुआ घास के ढेर के पास पहुँचा और एक छोटा सा गट्ठर बनाकर उसने दो पत्थरों को तेजी से रगड़ा, ऐसा करते ही चिंगारी निकली और घास के गट्ठर में आग लग गई।

“अब ये नहीं बच पाएंगे।” बोलता हुआ रघुवीर तेजी से मकड़ों की तरफ भागा।

नीता की चीख़ निकल गई – “रघुवीर! यह क्या कर रहे हो तुम? उनके पास मत जाना, वे बहुत खतरनाक है!”

लेकिन रघुवीर नहीं रुका, उसने जलता हुआ घास का गट्ठर मकड़ों की तरफ उछाल दिया। और ऐसा होते ही एकदम कमाल हो गया, जिस मकड़े के ऊपर गट्ठर गिरा, वह ऐसे जला जैसे मानों उसके ऊपर पहले से ही केरोसिन लगा हो और इसी के साथ उसके आसपास के मकड़े भी जलने लगे। बाकी मकड़े उन जलते हुए मकड़ों से दूर होकर दूसरी तरफ से घूम कर इन लोगों की तरफ और भी ज्यादा तेजी से बढ़ने लगे।

रघुवीर चीखा – “जल्दी करो! हमें इसी तरह के गट्ठर बना बनाकर आग लगा कर उनके ऊपर फेंकना होगा।”

रघुवीर के कहने की देर थी, बाकी सभी घास के ढेर की तरफ दौड़ पड़े। सरिता और नीता जल्दी जल्दी घास का गट्ठर बनाने लगी और बाकी दौड़ दौड़कर उनमें आग लगा कर मकड़ों की तरफ फेंकने लगे।

जल्द ही वह जंगल आग से भर गया। ऐसा लग रहा था जैसे जंगल में ही आग लग गई हो। अनगिनत मकड़े जल रहे थे। कुछ जलते हुए ही भाग रहे थे। कुछ आग को देख कर वापस जाने कहाँ गायब होते जा रहे थे लेकिन बहुत सारे मकड़े इस आग में जल कर राख हो गए।

रघुबीर बोला – “अब हमें जल्द से जल्द यहाँ से निकलना होगा क्योंकि मुझे हवा में अजीब सी स्मेल आ रही है, और यह स्मेल शायद इन मकड़ों के जलने की वजह से आ रही है, यह हमारे लिए बिल्कुल भी अच्छी नहीं है।

ठीक उसी समय भड़ाक की एक तेज आवाज हुई और अनुज अपने आप ही जमीन पर जा गिरा। सभी हक्के बक्के होकर उसे देखने लगे।

क्रमशः

भाग 6

“अरे इसे क्या हो गया? यह इस तरह से क्यों गिर गया?” अरविंद हैरानी से बोल उठा और उसे उठाने के लिए आगे बढ़ा।

रघुवीर बोला – “रुको! रुको! उसे मत छूना! उससे दूर हटो!”

रघुवीर की आवाज सुन कर सभी हैरान रह गए।

 “क्यों भला? ऐसा क्यों? हमारा साथी हमारे सामने बेहोश होकर गिर पड़ा और तुम कहते हो कि उसे मत छूना!” आगे बढ़ रहे अरविंद ने तैश में पूछा।

 “बिल्कुल, उसे मत छूना! सभी अपनी अपनी रुमाल निकालकर अपनी नाक पर बाँध लो! यह इनफेक्टेड हो चुका है, देखो इसकी पूरी बॉडी नीली पड़ती जा रही है। हमारे पास कोई मेडिसिन भी नहीं है और इसकी साँसें भी थम चुकी हैं। हम कुछ नहीं कर सकते इसे यहाँ छोड़ने के सिवा और अब हमें जल्द से जल्द यहाँ से निकल भागना होगा।” रघुबीर ने कहा।

सभी ने ध्यान से बेहोश पड़े अनुज को देखा तो सचमुच उसका शरीर नीला पड़ना शुरू हो चुका था। एक सेकंड की देरी किये बिना सभी ने अपनी जेब से अपने अपने रुमाल निकाले और मुँह पर बांध लिए।

रघुवीर आगे आगे चल रहा था और वे सभी पीछे पीछे, पूरे जंगल में हल्का हल्का नीला धुँआ फैलने लगा था, जो उन मकड़ों के जलने की वजह से निकला था। अब तक वहाँ मौजूद सारे मकड़े जल कर राख में बदल चुके थे। नीले धुँए की वजह से आसपास के हरे भरे पेड़ पौधे मुरझा कर नीले पड़ते जा रहे थे। लगभग भागते हुए उन सभी ने तेजी के साथ जंगल पार कर लिया। जंगल पार करते ही सामने जो सीन था उसे देख कर एक बार फिर सभी सन्न रह गए।

विक्रम बोला – “कमाल है! हमारे शहर के आस पास तो कोई रेगिस्तान नहीं है लेकिन यहाँ पर इतना बड़ा रेगिस्तान कहाँ से आ गया? अभी तो हम इतना दूर भी नहीं आए कि किसी दूसरे प्रदेश पहुँच गए हों।”

सरिता घबराई आवाज में बोली- “लगता है हम किसी तिलिस्म में फँस चुके हैं, वरना झुंड के झुंड साँप हमें कैसे दौड़ाते और वह तालाब… उस तालाब में जाने क्या था जो एक लकड़ी फैंकने पर भी मछलियाँ उस पर ऐसे टूट पड़ी थी जैसे कोई भूखा कुत्ता रोटी पर झपटता है और फिर यह बड़े बड़े मकड़े… यह सब नॉर्मल तो नहीं लगता है।”

रघुवीर सभी को परेशान देख कर बोल उठा – “तुम लोग ठीक कह रहे हो लेकिन अब जबकि हम यहाँ फँस चुके हैं तो इन मुसीबतों से लड़ कर यहाँ से बाहर निकलने के सिवा और कोई चारा नहीं है। हमें किसी भी तरीके से यहाँ से बाहर निकलना ही होगा।”

उन सभी ने पीछे घूम कर देखा तो पूरा जंगल नीले रंग के धुँए से भर चुका था। यहाँ तक कि आसमान में भी वह जहरीला धुँआ उड़ना शुरू हो चुका था।

नीता बोली – “अब तो हम वापस भी नहीं लौट सकते हैं, पूरे के पूरे जंगल में ही  खतरनाक जहरीला धुँआ फैला हुआ है और सामने इतना विशालकाय रेगिस्तान! इस रेगिस्तान का कहीं कोई छोर दिखाई नहीं दे रहा।”

रघुवीर ने कहा – “कुछ भी हो लेकिन अब हमें यहाँ से आगे बढ़ना ही होगा। हम यहाँ पर ज्यादा देर नहीं रुक सकते।”

इतना कहकर वह आगे आगे चलने लगा और बाकी लोग उसके पीछे पीछे, कई घंटे तक उस रेगिस्तान में भटकते रहने के बाद भी कोई ऐसा ठिकाना नहीं मिला जहाँ पर रुककर आराम कर सकें।

धूप इतनी तेज थी जैसे लगता था कि उनका सारा खून सोख लेगी। सभी ने पीछे मुड़कर देखा तो अब जंगल भी एक छोटे से बिंदु की तरह दिखाई दे रहा था, लेकिन जंगल की तरफ वे मुड़ नहीं सकते थे। उन्हें आगे ही बढ़ना था हर हालत में।

‘आहssss!’

अचानक अरविंद आगे बढ़ता हुआ एक गड्ढे में धंसने लगा। बाकी लोगों ने दौड़कर उसे उठाना चाहा लेकिन तब तक वह उस गड्ढे के अंदर समा चुका था। सभी ने झाँककर देखा तो गड्ढा बहुत ही गहरा था और.. और अंदर अंधेरा होने की वजह से कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन अरविंद की चीख़ अभी भी सुनाई दे रही थी।

“बचाओ,  मुझे बचाओ! अरे कोई मुझे यहाँ से निकालो, यहाँ तो दलदल जैसा लग रहा है।”

 “तुम चिंता मत करो! हम तुम्हें निकाल लेंगे! थोड़ी देर सब्र रखो!” रघुवीर ने तेज आवाज में कहा।

 तभी ठीक उसी पल –

 “ची.. ची.. ची.. गुर्रर्ररर!”

आसमान की तरफ से बहुत खतरनाक आवाज सुनाई दी। इससे पहले कि वे लोग कुछ समझ पाते, एक भयानक सा जीव उड़ता हुआ आया और अजय की बांह अपने पंजों में जकड़ कर आसमान में उड़ता चला गया।

“बचाओ! बचाओ!” अजय तेज आवाज में चीख पड़ा।

कोई कुछ समझ ही नहीं पाया कि अचानक से यह क्या हुआ। ध्यान से देखने पर वह बाज जैसे भयानक और बड़े-बड़े पंजो वाला एक काफी खतरनाक और विशालकाय जीव उनके साथी को अपने मजबूत पंजों में जकड़े हुए उड़ता चला जा रहा था और पलक झपकते ही वह आसमान में काफी ऊपर निकल गया।

“ची.. ची.. ची गुरर्रर्रर।”

 अभी यह लोग कोई रिएक्शन भी नहीं देने पाए थे कि तभी एक बार फिर उसी तरह की आवाज सुनाई दी।

“नीचे लेट जाओ! जल्दी करो।”

रघुवीर की तेज आवाज सभी के कानों में पड़ी तो सभी एक झटके में नीचे लेट गए।

आसमान से एक बार फिर एक और जीव उड़ता हुआ आया लेकिन इससे पहले कि वह किसी को दबोच पाता, वे सभी रेत में लेट चुके थे, जिसकी वजह से उसका निशाना चूक गया और वह दोबारा आसमान में उड़ता चला गया। रघुवीर और बाकी लोगों ने घूम कर आसमान की तरफ देखा तो अबकी बार दर्जन भर से ज्यादा उसी तरह के जीव उड़ते हुए उनकी तरफ झपटते चले आ रहे थे। हर एक की सांस ऊपर नीचे होने लगी।

विक्रम बोला – “कोई फायदा नहीं, हम अब इससे किसी भी तरह से नहीं बच सकते। इस तरह से अपना बचाव करते रहना बेकार है। कुछ नहीं होने वाला, हमें खुद ही इनके आगे सरेंडर कर देना चाहिए।”

 ऐसा कहते हुए वह उठ कर खड़ा हो गया और उसके खड़े होते ही आसमान से नीचे आ रहे जीव ने तुरंत एक झपट्टा मारा लेकिन रघुवीर ने तुरंत उसे नीचे खींच लिया।

वह एक बार फिर से चीखा – “ऐसी बेवकूफी कोई और मत करना क्योंकि हमारे पास बचने के बहुत से रास्ते हैं!”

 “कौन सा रास्ता है बचने का? क्या तुम हमें बता सकते हो?” सरिता ने डरी हुई आवाज में पूछा। रघुवीर उसे किसी मसीहा से कम नहीं लग रहा था।

रघुवीर बोला – “हाँ बिल्कुल बताऊँगा, लेकिन अभी तुम लोग रेंगते हुए मेरे पीछे पीछे आओ और अपना रास्ता भी बदलते रहो! ऊपर भी देखते रहो, अगर कोई बाज तुम्हारे ऊपर झपट्टा मारे तो उससे बचने के लिए पलटियाँ खा जाओ।”

ऐसा बोलकर रघुवीर रेंगता हुआ आगे बढ़ने लगा। ठीक तभी एक और बाज ने उन के ऊपर झपट्टा मारा। बाज के पंजों में रघुवीर की शर्ट आ लगी, उसने रघुवीर को ऊपर हवा में उठा लिया और अब तेजी से आसमान की तरफ उठने लगा। इसी के साथ एक भयानक आवाज उस जंगल में गूँज उठी-

“हा हा हा हा! कोई नहीं बचेगा मुझसे कोई भी नहीं! यह मेरा साम्राज्य है, यहां पर लोग आते तो अपनी मर्जी से है लेकिन जा नहीं सकते! हा हा हा!”

“नहीं sssss! रघुवीर sss!”  नीता जोर जोर से चीखने लगी।

क्रमशः

भाग 7

“हा हा हा हा!” अभी भी उस जंगल के चारों ओर भयानक ठहाके गूंज रहे थे लेकिन ठहाके लगाने वाला कहीं नजर नहीं आ रहा था।

“चर्रररर! हास्स्स!”

ठीक उसी समय एक अजीब तरह के भयानक बाज़ को नीता की तरफ लपकते हुए देख रघुवीर तेज आवाज में चिल्लाया,  “नीता! संभालो खुद को और देखो तुम लोगों की तरफ वे बाज बस झपटने ही वाले हैं उनसे बचो!”

बाज के पंजे में फंसा हुआ रघुवीर चीख कर बोला और जल्दी जल्दी अपनी शर्ट के बटन खोलने लगा। जल्द ही उसने सारी बटन खोल डाली और इसी के साथ उसने शर्ट निकाल डाला। शर्ट निकालते ही वह नीचे गिरने लगा और बाज के पंजे में फँसा हुआ शर्ट हवा में झूलने लगा।

नीचे रेत थी इसलिए रघुवीर को कोई खास चोट नहीं लगी।

“ची.. ची गुरर्रर्रर!”

उधर दर्जन भर बाज बाकी लोगों के ऊपर झपटने ही वाले थे कि तभी नीता और बाकियों ने रघुवीर की बहादुरी से इंस्पायर होकर दिलेरी दिखाई। उन सभी ने हाथों में रेत भर भरकर अपने ऊपर झपटने वाले बाज की आंखों में झोंक दिया और खुद किसी सर्कस के एक्सपर्ट खिलाड़ी की तरह कलाबाजियाँ खाते हुए इधर उधर हो गए।

बाज की आंखों में रेत पड़ी तो वे लड़खड़ा गए और इधर उधर होकर वापस आसमान में मंडराने लगे।

“रघुवीर! तुम ठीक तो हो ना?”

जैसे ही रघुवीर भागकर उन सभी के पास पहुंचा, नीता ने उसे गले से लगा लिया।

रघुवीर ने कहा – “हाँ, मैं बिल्कुल ठीक हूँ लेकिन यह समय बातें करने का नहीं है, वह देखो आसमान में! बाज वापस हमारी ही तरफ आ रहे हैं…!”

रघुवीर के शब्द पूरे भी नहीं हो पाए थे कि तब तक बाजों ने उन पर हमला बोल दिया। सभी इधर उधर होकर उनसे बच गए लेकिन नीता की किस्मत इतनी अच्छी नहीं थी।

एक बाज ने उसकी बाह पकड़ कर उसे हवा में ऊपर उठा लिया। नीता के मुँह से चीख निकल गई। ठीक तभी बिना एक भी सेकेंड की देरी किये रघुवीर ने उछल कर उस बाज के पंजे पकड़ लिए और नीचे खड़े लोगों की तरफ देख कर जोर से चिल्लाया।

“मेरे पैर पकड़कर नीचे खींचों।”

पलक झपकते ही उन लोगों ने लपककर रघुवीर के पैर पकड़ लिए और अब वह सभी पूरी जान लगा कर उसको नीचे खींचने लगे। आखिर बाज कब तक ठहर पाता उनकी सम्मिलित ताकत के सामने!

बाज ने नीता को छोड़ दिया था, लेकिन रघुवीर ने बाज को नहीं छोड़ा। उन लोगों की जोर आजमाइश से बाज भी रेत में नीचे आ गिरा और ऐसा होते ही रघुवीर उस पर झपट पड़ा।

“किर्रर्रर किरर्रर्रर हासssss!” बाज फड़फड़ा उठा।

रघुवीर उस बाज को मुक्के मुक्के मारने लगा। उसी के साथ बाकी लोग भी भिड़ गए। अब तक का सारी गुस्सा, सारा आक्रोश उन लोगों ने बाज पर उतारना शुरू कर दिया। बाज काफी शक्तिशाली था लेकिन इतने सारे लोगों का हमला झेल नहीं पाया। तभी रघुवीर ने बाज की गर्दन पकड़ कर पूरी ताकत से मरोड़ डाली। बाज एक बार छटपटाया और फिर झटका खाकर शांत पड़ गया।

ऊपर आकाश में एक बार फिर दर्जन भर से ज्यादा बाज मंडराने लगे। इससे पहले कि वह उनके पास आते, रघुवीर के इशारे पर सभी ने एक दिशा में दौड़ लगा दी।

रघुवीर ठीक उसी जगह जाकर खड़ा हो गया, जहाँ पर शुरू शुरू में अरबिंद गड्डे के अंदर गिरा था।

रघुवीर बोला – “इन सब से लड़ पाना हमारे बस की बात नहीं है, अगर हम यहाँ रहे तो इनका शिकार बन जाएंगे। इसलिए हमें इस गड्ढे में उतरना ही होगा।”

विक्रम बोला – “लेकिन फिर हम इस गड्ढे से बाहर कैसे निकलेंगे?”

रघुवीर ने कहा – “यह तो बाद की बात है, अभी तो जान पर पड़ी हुई है, जान बची रहेगी तो और भी तरीके सोच लेंगे। चलो जल्दी जल्दी इस गड्ढे में कूदो! हमारे पास टाइम बिल्कुल नहीं है।”

रघुवीर के बोलते ही विक्रम आगे आया और गड्ढे में उतर गया। इसी के साथ बारी बारी से सरिता और नीता भी गड्ढे में उतरने लगी। उनके पीछे विजय भी गड्ढे में उतर गया।

तभी एक बार फिर उड़ते हुए बाज उन सभी पर झपटे लेकिन इस बार भी उन्होंने इधर उधर कूद कर खुद को बचा लिया और रेत में मौजूद छोटे छोटे पत्थरों से बाजों पर हमला कर दिया।

कुछ देर के लिए बाज वहाँ से दूर हो गए। ठीक उसी पल रघुवीर ने भी गड्ढे में छलांग लगा दी। गड्ढा ऊपर से जितना सकरा था, नीचे से उतना ही ज्यादा चौड़ा। वहा खतरनाक अंधेरा मौजूद था और इसी के साथ घुटनों तक कीचड़ भरा हुआ था।

नीता बोली – “यह हम कहाँ आ गए? यहाँ तो कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा है और कीचड़… कीचड़ तो हमारे घुटने तक आ रहे हैं। आखिर हमें इसमें कब तक रहना होगा।’

धीरे धीरे उन लोगों की आँखें अंधेरे में देखने की अभ्यस्त हो रही थीं। रघुवीर ने गड्ढे के अंदर चारों तरफ देखा तो उसे दूसरी तरफ जाती हुई एक सुरंग दिखाई दी।

“इस सुरंग में कीचड़ का होना यह साबित करता है कि आसपास ही कहीं कोई पानी का स्रोत होगा। पानी के स्रोत में पानी कम होने पर यहाँ का पानी सूख गया और कीचड़ हो गया। मुझे लगता है कि हमें इस सुरंग से आगे बढ़ना चाहिए, हो सकता है हम इसी के सहारे बाहर निकल जाए।”

विक्रम बोला – “हो तो यह भी सकता है कि हम किसी नई मुसीबत में फंस जाएं।”

रघुवीर मुस्कुराता हुआ बोला – “अभी जो मुसीबत हमारे गले पड़ी हुई थी, वह क्या कम थी, अब अगर हमें बाहर निकलना है तो मुसीबत तो मोल लेनी ही पड़ेगी।”

अरविंद बोला – “सही कह रहे हो।”

“आहsss! उफ्फ! मेरे पैर।”

सरिता चिल्ला उठी और इसी के साथ उसने अपना हाथ घुटने के नीचे अपने पैरों पर लगाया तो एक बड़ी सी जोंक उसके पैर पर चिपक कर उसका खून चूस रही थी। एक ही झटके में उसने उस जोक को वहाँ से खींच निकाला। सभी उसे देख कर हैरान रह गए।

विक्रम बोल पड़ा – “हमें यहाँ ज्यादा देर तक नहीं रुकना चाहिए, लगता है इस दलदल में जोंक भरी हुई है!”

ठीक तभी नीता भी चिल्ला उठी। उसके पैरों में भी जोंक चिपक चुकी थी।

रघुवीर बोला – “चलो जल्दी जल्दी इस सुरंग को पार कर जाते हैं!”

लोगों को हिम्मत देने के लिए रघुवीर आगे हो गया, आगे सुरंग की ऊंचाई काफी कम थी जिसकी वजह से रघुवीर को नीचे तक झुक कर चलना पड़ रहा था और कुछ देर बाद सुरंग की छत इतना नीचे हो गई कि अब वह उस कीचड़ में लगभग तैरने लगा। बाकी लोग भी उसके पीछे पीछे चले आ रहे थे। इस बीच हर किसी को खतरनाक जोकों ने परेशान किया।

तैरते वक्त सभी ने करीब पचासों जोंकों को अपने शरीर से निकाल निकालकर दूसरी तरफ फेंका लेकिन हर बार वे वापस आकर चिपक जाती थी। इसी बीच रघुवीर को सामने कुछ प्रकाश दिखाई दिया।

रघुवीर खुशी से बोला – “वह देखो सामने प्रकाश दिखाई दे रहा है और उधर से हवा भी आ रही है, इसका मतलब हम बाहर निकलने वाले हैं!”

सभी एक्साइटेड हो गये, क्योंकि इतनी देर की जद्दोजहद के बाद आखिर वे सुरंग के मुहाने पर आ चुके थे।

लेकिन उन्हें नहीं पता था कि वे अनजाने में ही एक ऐसी मुसीबत की तरफ बढ़ रहे थे। जहां से बचकर निकलना नामुमकिन होने वाला था।

क्रमशः

8

‘घर्रर्रर्रर्र शीईईईई!’

सुरंग के मुहाने की तरफ से भयानक आवाज हुई। आवाज सुनकर सभी एक बार फिर काँप उठे।

अरविंद घबरा कर बोला – “मैंने तो पहले ही कहा था कि यहाँ भी हम बचने वाले नहीं हैं। बेकार में इतनी मेहनत करके यहाँ तक आ गए।”

रघुवीर उसकी बात को इग्नोर करके आगे बढ़ने लगा।

“रघुवीरsss! आगे खतरा है! इस तरह से आगे बढ़ना अपनी मौत को दावत देने जैसा है!” नीता ने चीख़कर कहा।

“टेंशन मत लो नीता! मैं अपनी सुरक्षा करने में समर्थ हूँ और तुम लोग भी तो मेरे साथ हो तो मुझे डरने की क्या जरूरत है?”

अब वह मुहाने से सिर्फ डेढ़ फुट की दूरी पर था। तभी उसे लपलपाती हुई जीभ दिखाई दी। वह जीभ एक फुट चौड़ी और कई फुट लंबी थी। जीभ लपकती हुई सुरंग के अंदर मौजूद रघुवीर की तरफ झपटी तो रघुवीर ने झपटकर उस जीभ को ही दबोच लिया इसी के साथ जीभ ने भी उसको जकड़ लिया।

अब जीभ बाहर की तरफ खिंचने लगी और इसी के साथ रघुवीर भी सुरंग में सरकता चला गया। इसके पहले कि रघुवीर सुरंग के बाहर हो पाता, नीता ने पीछे से उसके पैर पकड़ लिए और अपनी तरफ खींचने लगी। उसने रघुवीर को फँसते हुए  देख लिया था।

नीता के ऐसा करते ही बाकी लोगों ने भी ठीक वैसा ही किया,  या तो उन्होंने नीता के पैर पकड़ लिए या फिर रघुवीर के। उन सभी में खींचातानी शुरू हो चुकी थी। इसकी खींचा तानी में जीभ उखड़कर सुरंग के अंदर आ गई और खून का तेज फव्वारा पूरी सुरंग को नहला गया।

अरविंद बोल पड़ा- “बाप रे बाप! इतनी बड़ी जीभ मैंने अपनी जिंदगी में पहले कभी नहीं देखी, लेकिन यह जीभ है किसकी?”

विक्रम बोला – “यह तो बाहर निकलने पर ही पता चलेगा।”

रघुवीर तेजी से कीचड में सरकता हुआ सुरंग के बाहर निकलने लगा। उधर बाहर की तरफ से ‘घो.. घो.. घो!’ की भयानक सी आवाज आ रही थी।

“बाप रे बाप! इतनी बड़ी छिपकली!” सुरंग के बाहर निकलते ही रघुवीर के मुंह से निकला।

सामने का नजारा वाकई बहुत ही भयानक था। एक पाँच फुट लंबी और करीब तीन से चार फीट चौड़ी बड़ी भयानक छिपकली सामने मौजूद थी। उसके मुँह से लगातार खून बह रहा था।

एक एक करके सभी सुरंग के बाहर निकल रहे थे।

नीता चीख मार कर बोली – “अरे यह क्या है? यह तो बहुत अजीब सी छिपकली है और इसके मुँह से इतना सारा खून…! कहीं.. कहीं इसी की जीभ तो नहीं थी।”

सभी बाहर निकल चुके थे। छिपकली तड़प रही थी।

रघुवीर बोला – “अब हमें यहाँ से आगे की तरफ बढ़ना होगा, वरना हो सकता है इसी तरह की और भी छिपकलियाँ आ जाएं और अगर ऐसा हुआ तो हमारा बचना मुश्किल होगा।”

रघुवीर की बात सुन कर सभी लोग जल्दी जल्दी वहाँ से आगे की तरफ बढ़ने लगे।

तभी अरविंद बोल उठा – “लेकिन एक बात हैरान करने वाली है कि अभी तक हम रेगिस्तान के ऊपर थे और इस सुरंग में आने के बाद हम वापस जंगल में कैसे आ गए?”

रघुवीर बोला – “यह सब तो मुझे नहीं पता लेकिन अभी सिर्फ और सिर्फ यहाँ से निकलने पर ध्यान दो, बाकी चीज बाद में सोचेंगे!”

‘घर्रर्रर्रर्र.. घर्रर्रर्रर्र.. गुर्रर्ररर.. शीईईईई..!’

 तभी एक साथ कई तरफ से भयानक आवाजें गूँज उठी।

“यह सब क्या हो रहा है हमारे साथ? इस तरह के अजीब अजीब जीव पता नहीं कहाँ से आ रहे हैं, क्या अब हमें सरेंडर कर देना चाहिए? यहाँ तो हमें बहुत तेज भूख प्यास भी लग रही है, ऊपर से ये खतरनाक जीव! अब हमारा बचना मुश्किल है।” अरविंद ने हताशा भरी आवाज में कहा।

तभी अचानक से आसमान में बिजली कड़की और इसी के साथ वहां भयानक ठहाके गूंज उठे-

“हा हा हा हा हा! बहुत खूब! तुम्हारा खेल देखकर आनंद आ रहा है। अब इतनी आसानी से तुम्हारा शिकार नहीं करूंगा! हा हा हा हा!”

इस भयंकर आवाज को सुन सभी लोग हैरानी भरी नजरों से इधर-उधर देखने लगे लेकिन इन्हें कहीं भी ठहाके लगाने वाला शख्स दिखाई नहीं दिया।

अगले ही पल-

“घो घो घो!” की अजीब सी आवाज हुई और इसी के साथ अचानक से कई सारी भयानक छिपकलियाँ उनकी तरफ लपकती दिखाई दी। अब वहाँ से भागने का उन्हें कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। नीता घबरा उठी। उसके साथ बाकी लोग भी डरी हुई नजरों से छिपकलियों को देख रहे थे। वह छिपकलियाँ रेंगती हुई उनके पास चली आ रही थी जबकि रघुवीर के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था। उसने अपने आस पास देखा तो ठीक उसके पास ही एक छोटा सा और सूखा हुआ पेड़ खड़ा था।

“आह! बचाओ।”

ठीक इसी समय एक सरिता की चीख गूँजी। छिपकली ने अपनी लंबी जीभ में सरिता को लपेट लिया था और अब धीरे धीरे उसे अपने मुँह के अंदर खींचती जा रही थी।

बाकी लोग मारे डर के थर थर काँपने लगे क्योंकि उनके पास कोई ऑप्शन नहीं था बचने का, वह मरती हुई सरिता को भी नहीं बचा सकते थे।

सरिता पल पल मौत के मुँह मे जा रही थी, बाकी को अपनी पड़ी थी उसे कौन बचाता, दर्दनाक और भयानक चीख से पूरा जंगल दहल रहा था। आखिर में छिपकली सरिता को निगल ही गयी। एक छिपकली होती तो कोई कुछ करता लेकिन यहाँ तो दर्जन भर से ज्यादा छिपकलियाँ मौजूद थीं। वह भी पांच पांच फीट की।

अचानक एक जीभ लपलपाती हुई आई और उसने नीता की टांगे लपेट ली।

 “रघुवीर बचाओ!” वह गला फाड कर चीख़ उठी, छिपकली बस उसे अब मुंह मे लेने ही वाली थी। नीता अब भी चीख़ रही थी, चिल्ला रही थी, छिपकली उसे अपने मुँह में खींचती चली जा रही थी।

किसी का भी ध्यान इस तरफ नहीं था क्योंकि सभी अपनी अपनी जान बचाने में लगे हुए थे। चारों तरफ से छिपकलियाँ आगे बढ़ती आ रही थीं। अचानक रघुवीर ऊपर की तरफ उछला, उसने पेड़  से एक सूखी टहनी पकड़ कर तोड़ डाली और पलक झपकते ही एक और ऊँची छलांग लगाई।

उसने दोनों हाथों से टूटी हुई टहनी को पकड़ रखा था, टूटा हुआ नुकीला हिस्सा नीचे की तरफ था, वह हवा में तेजी से उछला और उस छिपकली की पीठ में वह टहनी पूरी ताकत से घोप दी।

“कींsssss! किरर्रर्रर!” 

ऐसा लगा जैसे छिपकली चीख़ उठी हो। छिपकली को देख कर ऐसा लगा जैसे उसकी आंखें अभी कूद कर बाहर आ जाएंगी। उसकी जीभ ढीली पड़ गई। इसी के साथ नीता भी आजाद हो गई।

 “डरो मत! इनका सामना करो!” रघुवीर ने तेज आवाज में कहा तो सभी ने तुरंत पीछे घूम कर सूखे हुए पेड़ से मजबूत टहनियां तोड़नी शुरू कर दीं और इसी के साथ सभी एक साथ उन छिपकलियों पर टूट पड़े। अब तक सरिता को उन छिपकलियों ने अपना ग्रास बना लिया था, लेकिन अब एकदम से पासा पलट चुका था।

 “रघुवीर बचो! देखो तुम्हारे पीछे…!” विक्रम चीखा तो रघुवीर तुरंत पीछे घूम गया लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।

क्रमशः

भाग 9

छिपकली ने रघुवीर के पैर अपनी जीभ में लपेट लिए थे। जिससे वह जमीन पर जा गिरा। अब छिपकली उसे अपनी तरफ खींचने लगी। हैरान परेशान बाकी लोग बाकी छिपकलियों में उलझे हुए थे। कोई रघुवीर की सहायता के लिए आगे बढ़ता कि तभी –

‘फच्च’ फूटने की एक तेज आवाज आई और छिपकली की आँखें फूट गई। रघुवीर ने टहनी के दो टुकड़े करते हुए एक साथ दोनों छिपकली की आँखों में दे मारा था। छिपकली की पकड़ ढीली पड़ गई। ऐसा होते ही उस ने टहनी खींच निकाली और एक भरपूर वार उसकी जीभ पर किया। टहनी उसकी जीभ को चीरते हुए जमीन के अंदर घुस गई। अब छिपकली बुरी तरह से तड़प रही थी। कुछ ही देर में वे सभी छिपकलियों को मार कर आगे बढ़ रहे थे।

“हमने सरिता को भी खो दिया।” अरविंद ने दुख भरी आवाज में कहा।

“मैंने पहले ही कह रखा है, अगर दिमाग से काम लोगे और सही समय पर सही तरीके से मुसीबत का सामना करोगे तो तुम लोग अपनी सुरक्षा खुद कर लोगे, अब जब पता है कि मौत सामने खड़ी है तो उससे डरने का कोई मतलब नहीं है, मरना तो सभी को है एक दिन, तुम्हारे शरीर में जब तक जान है तब तक सामने वाली मुसीबत का डट कर सामना करो।” रघुवीर ने समझाया।

सभी चुपचाप उसकी बात सुन रहे थे। अब तो वे सभी रघुवीर को अपना लीडर मान चुके थे क्योंकि अब तक उसने ही उनको हर मुसीबत से बचाया था।

“जबसे हम उस जीप से उतरे हैं तब से एक मिनट भी साँस लेने का मौका नहीं मिला। एक के बाद एक मुसीबतें आती जा रही हैं, समझ नहीं आ रहा है कि हमें किसकी नजर लग गई है।”  नीता रुआँसी आवाज में बोली।

अभी वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाई थी कि एक और मुसीबत उन सभी के सामने खड़ी थी।

“गुरर्रर्रर… गुर्रर्ररर.. !” एक बार फिर गुर्राहट भरी आवाज से उनका कलेजा धड़क उठा।

“वह देखो! तुम बिल्कुल सही कह रही हो! इधर यह छिपकलियाँ मरी नहीं कि उधर एक और मुसीबत आ खड़ी हुई। अब इससे कैसे बचा जाए?”

उन सभी के ठीक सामने पाँच फुट ऊँचा खतरनाक जंगली भेड़िया खड़ा गुर्रा रहा था।

उसकी हाइट नॉर्मल भेड़ियों से बहुत ज्यादा थी। उस भेड़िये के सामने रघुवीर और बाकी लोग बच्चे जैसे दिखाई दे रहे थे।

सभी के हाथों में अभी भी सूखे पेड़ की टूटी हुई टहनियाँ मौजूद थीं।

अरविंद बोला- “सूखी हुई टहनियों से इसे नहीं मारा जा सकता! बताओ अब हम इससे कैसे बचेंगे?”

भेड़िया उनकी तरफ देखकर लगातार गुर्रा रहा था। उसकी आँखें देखकर ऐसा मालूम पड़ता था जैसे वह कई दिनों का भूखा हो और अचानक से उसके सामने इतने सारे इंसान आ पहुँचे थे। अब भला वह उन्हें कैसे छोड़ता।

भेड़िया धीरे धीरे आगे बढ़ने लगा। रघुवीर भी घबरा चुका था क्योंकि भेड़िया काफी शक्तिशाली दिखाई दे रहा था और खतरनाक भी फिर भी उसने बाकियों को हिम्मत बंधाई – “डरना मत! तुम लोग बिल्कुल मत डरना! थोड़ी हिम्मत, थोड़ी बहादुरी और दिमाग के साथ इसका सामना करो। हम इसे भी जरूर हरा देंगे।”

कहने के साथ रघुवीर ने अपने हाथ में पकड़ी हुई टहनी को और मजबूती के साथ पकड़ लिया। नीता को रघुवीर ने अपने पीछे कर लिया था।

“गुर्रररर हास्स!”

ठीक तभी भेड़िए ने गुर्राकर छलांग लगा दी।

“नीचे फिसल जाओ!” रघुवीर चिल्लाया। सभी अचानक से ही नीचे जमीन पर फिसल गए। इसका फायदा यह हुआ कि भेड़िया उन सभी के ऊपर से निकलता हुआ पीछे खड़े एक मोटे से पेड़ से जा टकराया। एक पल के लिए जैसे उसका दिमाग झनझना गया हो, लेकिन फिर दूसरे ही पल वापस मुड़ा। अब वह पहले से भी ज्यादा गुस्से में दिखाई दे रहा था।

“हमें मिलकर इस पर एकसाथ हमला करना होगा।” रघुवीर ने दोबारा उन सभी से कहा तो सभी ने अपनी अपनी टहनियाँ कसकर हाथों में पकड़ लीं। बिना भेड़िए को आगे बढ़ने का मौका दिए वे खुद ही उसकी तरफ झपट पड़े।

जोश में आकर विक्रम नुकीली टहनी लिए भेड़िए की तरफ सबसे पहले भागा। यही उसने गलती कर दी। जैसे ही वह भेड़िए के पास पहुँचा, भेड़िये के पंजे का एक ही वार उसके लिए उसकी मौत का सबब बन गया। उसका सिर धड़ से अलग हो चुका था और धड़ एक मिनट के लिए जस का तस खड़ा रह गया। पीछे भाग कर आते हुए लोग अवाक से उसे देखते रह गए। तभी विक्रम का धड़ कटे हुए पेड़ की तरह जमीन पर गिर गया। उसके गले से खून का पनारा बह निकला।

“मैंने कितनी बार कहा था कि ऐसी बेवकूफी मत किया करो,  एक्सट्रा बहादुरी दिखाने से बचो। पर सुनता कौन है लो ये भी गया।”

रघुवीर अभी बोल ही रहा था लेकिन उसे इस बात की भनक भी नहीं लगी कि उसकी मौत ने उसके ऊपर छलांग लगा दी थी।

“गुर्ररर…गुर्ररर!”

एक तेज गुर्राहट के साथ भेड़िये ने एक ऊंची छलांग लगाई, अब वह सीधा रघुवीर पर हमला करने ही वाला था। अरविंद का मुंह खुला का खुला रह गया क्योंकि अब रघुवीर का बचना लगभग इंपॉसिबल था। भेड़िया बस उसका सिर धड़ से अलग करने ही वाला था।

उसने रघुवीर के ऊपर छलांग लगा दी थी। रघुवीर भी बिल्कुल जड़ होकर खड़ा रह गया था। उसे एक पल के लिए कुछ भी समझ में नहीं आया। ऐसा लगा जैसे अब उसका काम तमाम होने वाला था। हाथ में पकड़ी हुई टहनी नीचे लटक रही थी। उसके दिमाग ने लगभग काम करना बंद कर दिया था। ठीक तभी जैसे एक चमत्कार हुआ।

‘धप्प’

रघुवीर के कंधे पर किसी का पैर पड़ा और एक झटके में ही मोटी और नुकीली सूखी हुई टहनी उस भेड़िये की गर्दन में उतनी ही फुर्ती के साथ जा घुसी जितनी फुर्ती से उसने छलांग लगाई थी।

“हम्फ हुसशस!”

चिंघाड़ मारता हुआ भेड़िया दूसरी तरफ जमीन पर इस तरह से गिरा जैसे अचानक ही उसके शरीर को लकवा मार गया हो। भेड़िए की गिरते ही हमलावर ने उसे एक मिनट का भी समय नहीं दिया और झपट कर सूखी टहनी उसकी गर्दन से खींच निकाली।

भेड़िये की गर्दन में टहनी घुसने की वजह वह से बेहाल हो चुका था लेकिन हमलावर ने रिस्क लेना सही नहीं समझा। हमलावर कोई और नहीं बल्कि नीता थी।

“नीता तुम ..!”  रघुवीर के मुंह से बस इतना ही निकला और बिना एक पल की देरी किए वह भी भेड़िये पर झपट पड़ा।

क्रमशः

भाग 10

अब तो अरविंद और विजय भी जैसे अचानक नींद से जाग उठे थे।

 “मार डालो इस दरिंदे को।” अरविंद चीखा और एक साथ ही उन्होंने उस पर हमला बोल दिया। पल भर में ही भेड़िये की गर्दन और पेट में दर्जन भर टहनियाँ घुसी हुई थी और आसपास की जमीन खून से लाल हुई पड़ी थी। आखिर में उन लोगों ने उसे मार डाला।

रघुवीर हैरानी से नीता को देखता हुआ बोला – “मुझे उम्मीद नहीं थी कि तुम ऐसा कमाल कर पाओगी! अब तक तो मैं समझता था कि तुम्हें यह सब फाइटिंग वगैरह आती ही नहीं! लेकिन आज तो तुमने मुझे चौंका दिया!”

नीता मुस्कुराती हुई बोली – “मैंने भी ताइक्वांडो कर रखा है, तुम्हें क्या लगता है, सड़क पर चलते हुए मैं इसका इस्तेमाल करूंगी? मेरे गुरुदेव ने मुझे सिखाया है जब तक जान पर न आ जाए, तब तक इसका इस्तेमाल नहीं करना है।”

 रघुवीर ने तारीफ भरी नजरों से उसे देखा।

“अब हमें यहाँ ज्यादा देर नहीं रुकना चाहिए! हम बातें करके अपना समय ही खराब कर रहे हैं। मुझे लगता है जल्द से जल्द हमें आगे बढ़ना चाहिए।” अरविंद ने कहा तो विजय भी उसकी बात से सहमत था।

 रघुवीर बोला – “तुम बिल्कुल ठीक कह रहे हो!”

और इसी के साथ वे आगे बढ़ गए।  रघुवीर समझ नहीं पा रहा था यह सब हो क्या रहा था।

जैसा कि हर बार होता था, इस बार भी उनके सामने एक और मुसीबत आने वाली थी।

नीता बोली – “हमें सावधानी से आगे बढ़ना होगा, पिछला रिकॉर्ड देखते हुए आगे कोई ना कोई खतरा जरूर आएगा और जिस तरह से हमने पीछे अपने साथियों को खोया है, मैं नहीं चाहती कि अब आगे कोई भी मारा जाए।”

अरविंद बोला – “किसे पता कहाँ कौन सी मुसीबत आ जाए, इसलिए कहा नहीं जा सकता कि आगे हम अपने आप को बचा पाएंगे या नहीं।”

रघुवीर बोला – “बात तुम्हारी ठीक है लेकिन सतर्क रहने पर हम अपने आपको जरूर बचा लेंगे और मुझे तो ऐसा लग रहा है कि हम जल्द ही इन मुसीबतों को पार करके वापस अपने घर को लौट चलेंगे।”

“अरे! यह क्या? सामने तो देखो कितने पतले पतले रास्ते हैं, और उनके बगल में आग के दरिए।” अरविंद ने चौंक कर कहा।

रघुवीर बोला – “अभी इतने सारे रास्ते हैं तो हमें एक साथ अलग अलग रास्तों से निकल कर जल्दी से यह एरिया पार कर लेना चाहिए।”

“लेकिन मैं तो तुम्हारे ही साथ चलूंगी!” नीता ने कहा। इसी के साथ वे आगे बढ़ गये। उन्होंने देखा ही नहीं कि वे पतले रास्ते आगे चल कर और भी दूर दूर यानी उन सभी को एक दूसरे से काफी दूर करने वाले थे। सामने एक घना जंगल था। दूसरी तरफ एक तालाब भी था। रघुवीर पतली पगड़न्ड़ी पर चल रहा था। वह पगडंडी उसे तालाब में बीचों-बीच एक टीले पर ले गई।

उसी के पीछे नीता भी थी। जैसे ही वे टीले पर पहुंचे। खतरनाक मगरमच्छ तालाब से निकलकर उनकी तरफ झपटने लगे।

नीता और रघुवीर दोनों घबरा गए। दूसरी तरफ अरविंद और विजय अलग मुसीबत में फंस चुके थे। जैसे ही वे पगडंडी पार करके घने जंगल में पहुँचे, बड़े से अजगर ने उन दोनों को दबोच लिया, वो दोनों जितने कसमसा रहे थे, अजगर उन्हें उतना ही जकड़ता जा रहा था।

रघुवीर ने कहा, “डरो मत! बिल्कुल भी मत डरो! और इन सभी का बहादुरी से सामना करो! अगर तुमने बिना डरे इनका सामना किया तो तुम इनसे बच कर बाहर निकल सकते हो। इनसे लड़ने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दो! अपने दिमाग का इस्तेमाल करो! हम इस मुसीबत से भी जरूर निकल जाएंगे, जैसे बाकी मुसीबतों से निकल आये।”

उधर अजगर ने अपने अरविंद और विजय को अपनी पूंछ में बुरी तरह जकड़ लिया था और इसी के साथ अजगर ने एक जोर का झटका दिया। जिससे जोरदार ‘कड़ाक’ की आवाज हुई और इसी के साथ तेज चीख के साथ अरविंद और विजय दोनों की हड्डियां चटक गई। दोनों ही वहीं बेहोश हो गये।

अगले ही पल अजगर ने उन दोनों को निगलना शुरू कर दिया और जल्द ही उन्हें निगल गया।

अजगर के मुंह से मांस चबाने की भयानक आवाजें आ रही थी और इसी के साथ चारों तरफ़ भयानक ठहाके गूंज रहे थे।

अब बचे थे तो सिर्फ नीता और रघुवीर, जिनके ऊपर मगरमच्छ हमला करने की कोशिश कर रहे थे लेकिन मगरमच्छ पानी से बाहर नहीं आ रहे थे इसी वजह से दोनों बचे हुए थे।

“हमें इन पर हमला करना ही होगा! हम ऐसे ही यहां खड़े नहीं रह सकते।” रघुबीर ने कहा।

 “बिल्कुल! मुझे भी यही लगता है। मुझमें जब तक जान है तब तक तो मैं तुम्हारे साथ इन सबसे लड़ती रहूंगी।”  रघुवीर ने तारीफ भरी नजरों से नीता को देखा, तभी एक मगरमच्छ ने तालाब के अंदर से ही उनके ऊपर झपट्टा मारा। घूरती हुई आंखों से नीता ने उसे देखा और फिर एक ही झटके में अपने हाथ में थमी हुई टहनी उसकी आंखों में घुसेड दी।

“भल्ल भल्ल” करके मगरमच्छ की आंखों से ख़ून निकलने लगा। उसी समय एक और मगरमच्छ ने नीता पर पीछे से हमला किया, जिसकी तरफ न तो रघुवीर का ध्यान था और न ही नीता का, मगरमच्छ ने नीता को तालाब के अंदर घसीट लिया और देखते ही देखते नीता की चीखों से रघुवीर का दिल दहल गया।

वह तालाब में छलांग लगाने ही वाला था कि नीता चीख पड़ी, “नहीं रघुवीर नहीं, तुम्हें हम सबकी मौत का का बदला लेना है, इन सबके पीछे जो कोई भी है उसको तबाह करना है, खुद को संभालो रघुवीर….” इससे पहले कि वह कुछ और बोल पाती, एक खच्च की आवाज हुई और उसका आधा जिस्म मगरमच्छ के जबड़े में कटकर अलग हो चुका था। बोलने के लिए खुला नीता का मुंह खुला ही रह गया।

रघुवीर अपने घुटने के बल जमीन पर आ गिरा। वह भाव शून्य नजरों से बस तालाब में फैलते जा रहे ख़ून को देख रहा था। अचानक ही वह फफक फफक कर रोने लगा। मगरमच्छ नीता के दो टुकड़े करके पानी के अंदर समा चुके थे। तालाब का पानी एकदम लाल हो चुका था।

ठीक उसी समय किसी के जोरदार ठहाके फिजा में गूंज उठे।

“हा हा हा हा, जो भी यहाँ आता है, यही मौत पाता है, इससे भी बुरी मौत, अब तू भी जल्द ही तड़प तड़पकर मरेगा हा हा हा हा।”

रघुवीर की मुट्ठियाँ अचानक भींचने लगी, वह गुस्से में उठ खड़ा हुआ, उसने अपने चारों तरफ घूम कर देखा पर कोई दिखाई न दिया।

वह गला फाड़ कर चीख पड़ा, “कौन है तू, सामने आ, मैं तुझे कुत्ते की मौत न मारूँ तो मेरा नाम रघुवीर नहीं।”

चारों तरफ गहन सन्नाटा फैल गया। पिन ड्राप सन्नाटा। अगर कुछ था तो रघुवीर की आवाज ही उसके कान में फिर गूंज रही थी।

क्रमशः

भाग 11

कुछ देर के लिए वहाँ पर सन्नाटा पसरा रहा। रघुवीर के कानों में खुद उसकी ही आवाज बार बार गूँज रही थी। आखिर में अचानक एक तेज हवा का झोंका उसके शरीर से टकराया तो वह दो कदम पीछे हो गया। उसने हवा के झोंके की तरफ देखा। ऐसा लगा जैसे आसमान से एक बहुत भारी बवंडर उठकर उसकी तरफ बढ़ता चला रहा हो। वह उस बवंडर को देखकर हैरान रह गया।

“अब तूने मुझे ललकारा है तो सामने तो आना ही पड़ेगा। लेकिन जब मैं किसी के सामने आता हूँ तो उसे इतना तड़पाता हूँ कि वह मेरे सामने रोकर सिर्फ और सिर्फ अपनी मौत माँगता है सिर्फ मौत! हा हा हा!”

बहुत तेज आवाज गूँजी और इसी के साथ माहौल में मनहूसियत और भी तेजी से फैलने लगी। हवा के झोंके तेज और तेज होते चले गए। जैसे जैसे बवंडर पास आ रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे वह उसे उड़ाकर अपने साथ ले जाएगा और अचानक बिल्कुल वैसा ही हुआ।

हवा का एक बहुत भारी झोंका आया और रघुवीर को एक ही झटके में अपने साथ उड़ा ले गया‌। रघुवीर हवा में कलाबाजियाँ खाता हुआ बहुत दूर तक उड़ता चला गया। उसे होश ही नहीं था कि हवा का वह भयंकर अंधड़ उसे उड़ाकर कहाँ ले जा रहा था। आखिरकार वह एक खुले मैदान में आकर गिरा। गिरते ही उसे ऐसा लगा जैसे उसकी रीढ़ की हड्डी टूट गई हो। उसके मुँह से हल्की सी चीख निकल गई।

अभी वह खुद को संभाल भी नहीं पाया था कि तभी ऐसा लगा जैसे उस मैदान में कुछ बड़ी तेजी से गिरा हो। उसने आवाज की दिशा में देखा तो बस देखता ही रह गया। उसके पूरे शरीर में डर की एक तेज लहर सी दौड़ गई। वह भीतर ही भीतर काँप उठा। उसके सामने एक आठ फुट का बहुत ही भयानक शैतान खड़ा था। बिल्कुल काले रंग के उस शैतान के दाँत मोतियों की तरह चमक रहे थे और आँखें जैसे लाल भभूका बनी हुई थीं।

“देख, मैं आ गया तेरे सामने! मुझे उन लोगों का मांस खाना बहुत पसंद है जो मुझे ललकारते हैं! मुझे ऐसे हिम्मती लोगों से अपनी भूख शांत करना बहुत पसंद है और आज मैं तुझसे अपनी भूख शांत करूँगा! हा हा हा!”

और इसी के साथ वह खतरनाक तरीके से रघुवीर की तरफ बढ़ने लगा। जबकि रघुवीर अभी तक अपने आप को जमीन से उठा भी नहीं पाया था। वह धीरे धीरे उठने की कोशिश कर रहा था। लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे सचमुच उसकी रीढ़ की हड्डी टूट गई हो। वह धीरे धीरे पीछे की तरफ सरकने लगा।

 “नहीं! नहीं! तुम मुझे नहीं मार सकते!” डर से भरी हुई आवाज रघुवीर के मुँह से अनायास ही निकल गयी। जबकि आज तक वह कभी किसी से नहीं डरा था। लेकिन आज उसे ऐसा लग रहा था जैसे सचमुच उसका डर से सामना हुआ हो।

 “हा हा हा हा! क्या हुआ? अभी तक तो शेर बना हुआ था। अब चूहें की तरह मिमिया रहा है।” और ऐसा कहते हुए वह शैतान एक ही छलांग में रघुवीर के एकदम पास आकर खड़ा हो गया।

उसने रघुवर की एक टाँग पकड़ी और एक ही झटके में उखाड़ ली।

“नहींऽऽ…” रघुवीर की मर्मांतक चीख उबल पड़ी। वह भयानक तरीके से चिल्लाने लगा। दर्द की बेशुमार लहरें उसके शरीर के कोने कोने को जैसे हिला कर रख दे रही थी। उधर शैतान ने रघुवीर का पैर सीधे अपने मुँह से लगाया और उसकी जाँघों का माँस नोंच नोंचकर खाने लगा।

 “चपड़ चपड़” की भयानक आवाज से वहाँ का माहौल अत्यंत डरावना हो चला था। एक तरफ रघुवीर दर्द से छटपटा रहा था तो दूसरी तरफ शैतान उसके पैर के माँस को चबा चबाकर खा रहा था। जल्दी ही पैर की हड्डियों को उसने एक तरफ उछाल दिया और आगे बढ़कर उसका दूसरा पैर भी उखाड़ दिया।

खून से जमीन लाल हो चुकी थी। रघुवीर के दोनों पैर उखड़ चुके थे लेकिन यह रघुवीर की जीवटता ही थी जो वह अभी भी यह सब जेल रहा था। उसके दोनों पैरों को खाने के बाद शैतान भयानक तरीके से आगे बढ़ा और अगले ही पल उसने रघुवीर के दोनों हाथों को भी उसके शरीर से उखाड़कर अलग कर दिया।

अब रघुवीर का सिर्फ सिर और धड़ ही मौजूद था। कुछ ही देर में शैतान फिर से रघुवीर के सामने खड़ा जोर जोर से ठहाके लगा रहा था। उसका मुँह ख़ून से लाल हुआ पड़ा था। उसके हाथों से ख़ून टपक रहा था।

 “मानना पड़ेगा! तेरे अंदर बहुत हिम्मत है। इतना कुछ होने के बाद एक साधारण इंसान का जिंदा रहना संभव नहीं है लेकिन तू यह सब होने के बावजूद भी अभी भी जिंदा है लेकिन मैं भी तुझे मरने नहीं दूँगा। अभी तो मैं तुझे और तड़पाऊँगा क्योंकि तूने मुझे ललकारा है और मैं मुझे ललकारने वाले के जिस्म से जब तक एक एक मांस नोंच नहीं लेता। तब तक उसे मरने भी नहीं देता हूँ।”

कहने के साथ शैतान उसकी तरफ बढ़ने लगा। भयानक दर्द से जूझ रहे रघुवीर ने जब उसे अपनी तरफ बढ़ते हुए देखा तो उसके मन में अचानक एक ख्याल आया।

“इस शैतान के हाथों मरने से अच्छा मुझे खुद को ही खत्म कर लेना चाहिए लेकिन अब ना तो मेरे हाथ है और ना मेरे पैर। अब मैं कैसे खुद को खत्म कर सकता हूँ।”

सोचते हुए उसने अपना सिर घुमाकर आसपास देखा। उसके ठीक बगल में ही एक खाई मौजूद थी। किसी तरह से अपने शरीर को घसीटता हुआ रघुवीर खाई के पास पहुँच गया।

उसे इस तरह से घिसटाते देखकर शैतान और भी जोर से ठहाका लगा उठा, “अब तो तू मरने की कगार पर है लेकिन तेरी हिम्मत अभी भी बाकी है और यही चीज मुझे तुझे तड़पा तड़पाकर मारने के लिए प्रेरित कर रही है।” लेकिन इससे पहले कि शैतान आगे कुछ बोल पाता। रघुवीर ने एक करवट ली और इसी करवट के साथ वह खाई में नीचे गिरते चला गया।

वर्तमान-

“मुझे नहीं पता कि इसके बाद क्या हुआ। मैं यहाँ तक कैसे पहुँचा?” कहने के साथ रघुवीर चुप हो गया।

वहां खड़े हर एक की आँखों में डर का जबरदस्त तूफान दिखाई दे रहा था। रघुवीर की कहानी सुनकर सभी हैरान थे।

तभी डॉक्टर अचानक से बोल उठा, “दरअसल खाई में गिरने के बाद तुम जंगल की श्रापित नदी के साथ बहते हुए किनारे पर आ पहुंचे थे। मछुआरों ने तुम्हें बचाकर यहाँ अस्पताल पहुँचा दिया।”

पुलिस इंस्पेक्टर ने रघुवीर की तरफ बढ़ते हुए कहा, “इसका मतलब कि उस जंगल के श्रापित होने की बात बिल्कुल सत्य है। वहाँ सचमुच किसी शैतान का ठिकाना है।”

“हाँ इंस्पेक्टर, मैं चाहकर भी उस शैतान का भयानक चेहरा भूल नहीं पा रहा हूँ। रह रहकर मेरे कानों में उस शैतान के भयानक ठहाके गूंज रहे हैं। वह…वह मार डालेगा…वह हर उस शख्स को मार डालेगा जो उस श्रापित जंगल में अपने कदम रखेगा। वह शैतान किसी को नहीं छोड़ेगा किसी को भी नहीं!”

रघुवीर ने बहुत ही गंभीर आवाज में कहा। उसकी आँखों में अभी भी खौंफ नजर आ रहा था और आता भी क्यों नहीं आखिर एक ही रात में उस मौत के जंगल ने उसकी पत्नी नीता और अपने कई साथियों को निगल लिया था।

समाप्त।

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